
उदयपुर। उदयपुर की धरा पर जब सेवा का संकल्प और अध्यात्म की शक्ति एक साथ मिलते हैं, तो नज़ारा कुछ अद्भुत ही होता है। शनिवार को झीलों की नगरी में स्थित नारायण सेवा संस्थान का नव-निर्मित परिसर ‘वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी’ उस समय साक्षात तीर्थ बन गया, जब वहाँ राष्ट्र संत और मानवता के महान संदेशवाहक ललितप्रभ सागर महाराज एवं शांतिप्रिय सागर मुनिराज का मंगल प्रवेश हुआ।
जैसे ही संतों के चरण इस सेवा की दहलीज पर पड़े, पूरा वातावरण एक दिव्य आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। संस्थान के संस्थापक और ‘सेवा के पर्याय’ कैलाश मानव ने जब संतों की अगवानी की, तो उपस्थित जनसमूह की आँखें श्रद्धा से नम थीं। महाराज श्री ने जब दीप प्रज्ज्वलित किया, तो वह केवल एक प्रकाश नहीं, बल्कि उन हज़ारों दिव्यांगों के जीवन में आने वाली नई उम्मीदों का प्रतीक था, जिनकी सेवा यह संस्थान दिन-रात कर रहा है।
परिसर का अवलोकन करते हुए महाराज श्री का हृदय भी भर आया। दिव्यांगों और निराश्रितों के प्रति संस्थान की निस्वार्थ सेवा को देख उन्होंने अत्यंत मर्मस्पर्शी बात कही:
“कैलाश मानव जी सेवा के वो जीते-जागते झरने हैं, जिनसे करुणा का जल कभी समाप्त नहीं होता। प्रशांत और वंदना अग्रवाल ने इस विरासत को केवल संभाला नहीं है, बल्कि अपनी साधना से इसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। यह स्थान पत्थर का भवन नहीं, बल्कि गिरते हुए लोगों को थामने वाला करुणा का आंचल है।”
महाराज श्री ने कहा कि आज इस संस्थान की वजह से न केवल राजस्थान बल्कि पूरे भारत का गौरव दुनिया में बढ़ा है। उन्होंने संस्थान के संरक्षक पारस कटारिया के समर्पण की भी सराहना की। संतों की उपस्थिति में कार्यकर्ताओं ने यह संकल्प दोहराया कि वे मानवता की इस मशाल को कभी बुझने नहीं देंगे।
इस पावन अवसर पर संबोधि धाम के पदाधिकारियों सहित दिनेश वैष्णव, महिम जैन और अनेक श्रद्धालुओं ने संतों का आशीर्वाद लिया। आज ‘वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी’ केवल एक केंद्र नहीं, बल्कि श्रद्धा और सेवा का संगम बनकर आलोकित हो उठा।
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