
कोल्हापुर। आज देश-दुनिया के लगभग हर कोने में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमाएं स्थापित हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनकी सबसे पहली प्रतिमा कब और कहां लगी थी? दिलचस्प तथ्य यह है कि बाबासाहेब की पहली प्रतिमा उनके जीवित रहते ही महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित बिंदू चौक पर स्थापित की गई थी। इस ऐतिहासिक कार्य के पीछे एक दिलचस्प संघर्ष और समर्पण की कहानी छिपी है।
भाई बागल : वह क्रांतिकारी विचारक जिन्होंने की पहल
इस प्रतिमा के निर्माण का श्रेय कोल्हापुर के प्रसिद्ध विचारक, स्वतंत्रता सेनानी और कलाकार माधवराव खंडेराव बागल को जाता है, जिन्हें प्यार से लोग ‘भाई बागल’ कहते थे। सत्यशोधक विचारधारा से प्रभावित भाई बागल महात्मा फुले और डॉ. आंबेडकर को ही अपना ‘ईश्वर’ मानते थे। उन्होंने समाज में छुआछूत के खिलाफ और सामाजिक समानता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था।
एक शादी में आया था प्रतिमा का विचार
भाई बागल ने अपनी आत्मकथा ‘जीवन प्रवाह’ में उल्लेख किया है कि प्रतिमा स्थापित करने का विचार सबसे पहले गंगाराम कांबले ने एक रिश्तेदार की शादी के दौरान उनके सामने रखा था। गंगाराम कांबले वही व्यक्ति थे जिन्हें राजर्षि शाहू महाराज का संरक्षण प्राप्त था। भाई बागल ने तुरंत इस विचार को स्वीकार किया और प्रतिमा निर्माण की घोषणा कर दी।
निर्माण की चुनौतियां और जन-भागीदारी
प्रतिमा निर्माण का कार्य मूर्तिकार बाल चव्हाण को सौंपा गया। हालांकि, इस नेक काम में कई बाधाएं भी आईं:
धन की कमी : प्रतिमा के लिए ज्यादातर राशि भाई बागल ने स्वयं लोगों के बीच जाकर और सहयोगियों के साथ मिलकर जमा की।
प्रशासनिक अड़चनें : तत्कालीन स्थानीय प्रशासन और नगरपालिका ने दान और स्थान की स्वीकृति रद्द कर दी थी, लेकिन भाई बागल अपने निर्णय पर अडिग रहे।
आम जनता के हाथों हुआ अनावरण
भाई बागल की सोच लीक से हटकर थी। वे नहीं चाहते थे कि किसी बड़े नेता या सरकारी अधिकारी के हाथों इस प्रतिमा का अनावरण हो। उनका मानना था कि डॉ. आंबेडकर आम लोगों के नेता हैं, इसलिए उद्घाटन भी आम आदमी ही करेगा।
9 दिसंबर 1950 को भाई बागल ने भीड़ में से दो आम नागरिकों का हाथ पकड़ा और उनके हाथों से बाबासाहेब की पहली प्रतिमा का अनावरण करवाया।
बाबासाहेब ने स्वयं देखी थी अपनी प्रतिमा
भाई बागल के लिए सबसे गर्व की बात यह थी कि यह प्रतिमा डॉ. आंबेडकर के जीवनकाल में लगी थी और उन्होंने स्वयं इसे देखा था। भाई बागल ने मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर बाबासाहेब के साथ भोजन भी किया था, जहाँ आंबेडकर ने उन्हें सलाह दी थी— “संगठन को मजबूत होने दीजिए, लोग जातिवाद का आरोप लगाएंगे तो लगाने दीजिए।”
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