
उदयपुर। सवा सौ साल का इतिहास समेटे हुए शहर का फेफड़ा ‘गुलाबबाग’ आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जिस विरासत को 90 के दशक के सूखे के बाद बड़ी मुश्किल से सींचा गया था, आज वह फिर से सिस्टम की बेरुखी का शिकार है। मॉर्निंग वॉकर्स का दर्द यह है कि जिन रास्तों पर कभी सुकून मिलता था, वहां अब अव्यवस्थाओं का अंबार है।
सत्ता के शिखर पर बैठे माननीयों की ‘चुप्पी’ और ‘अनदेखी’
गुलाबबाग का कायाकल्प कभी गुलाबचंद कटारिया की प्राथमिकता हुआ करता था। उनके प्रयासों से मिराज वाटिका, अहिंसा वाटिका और कई भामाशाहों (RSMM, सिंघल परिवार) ने इस बाग को नया जीवन दिया। लेकिन आज हालात बदल चुके हैं:
राज्यपाल महोदय की बेरुखी : कटारिया जी पंजाब में राज्यपाल हैं, स्थानीय राजनीति में उनकी दिलचस्पी बरकरार है, लेकिन ऐसा लगता है कि अब ‘गुलाबबाग’ उनकी प्राथमिकता सूची से बाहर हो चुका है।
विधायक जी का आयड़ मोह : शहर विधायक ताराचंद जैन अपनी पूरी ताकत अन्य प्रोजेक्ट्स और आयड़ के चक्कर लगाने में झोंक रहे हैं। जनता पूछ रही है कि क्या गुलाबबाग इस शहर का हिस्सा नहीं? जितना समय आयड़ को दिया जा रहा है, उसका 10% भी अगर गुलाबबाग को मिल जाए, तो इस विरासत की तस्वीर बदल सकती है।
सांसद की उदासीनता : सांसद मन्नालाल रावत को लेकर आमजन में भारी रोष है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें शहर के बुनियादी मुद्दों से कोई सरोकार ही नहीं है। वक्त आ गया है कि सांसद और विधायक मद की राशि का ‘लेखा-जोखा’ चौराहों पर बोर्ड लगाकर टांगा जाए, ताकि जनता जान सके कि विकास का पैसा आखिर जा कहां रहा है?
बैठकों तक सीमित कलेक्टरी और निगम की व्यस्तता
नए जिला कलेक्टर की कार्यशैली पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। कलेक्टर साहब की सक्रियता केवल ‘बैठकों’ तक सीमित नजर आ रही है। जनता से जुड़ाव का अभाव ऐसा है कि या तो वे मिलना नहीं चाहते या उनके इर्द-गिर्द का तंत्र उन्हें मिलने नहीं दे रहा। वहीं, नगर निगम कमिश्नर यूडी टैक्स की वसूली और अन्य कागजी झमेलों में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें गुलाबबाग की उजड़ती सड़कों और ट्रेक की सुध लेने की फुरसत नहीं है।
ग्राउंड रिपोर्ट : ये है गुलाबबाग की असली तस्वीर
दिखावे के लिए सड़कें भले ही साफ हों, लेकिन हकीकत झाड़ियों और साइडों में छिपी है:
कचरे के ढेर : सूखे पत्तों के ढेर हफ्तों तक नहीं उठाए जाते। पिछले दिनों RSS कार्यकर्ताओं ने सफाई की, लेकिन प्रशासन ने उन पत्तों को उठाना तक मुनासिब नहीं समझा।
उजड़ा हुआ वॉकिंग ट्रेक : पैदल चलने वालों के लिए बनाया गया ट्रेक पूरी तरह जर्जर हो चुका है।
दम तोड़ती पहचान : गुलाबबाड़ी और किकरबाड़ी अपनी पहचान खो रहे हैं। देखरेख के अभाव में ये लुप्त होने की कगार पर हैं।
टूटा हुआ ओपन जिम : शहर का सबसे व्यस्त ओपन जिम, जहां बुजुर्ग, महिलाएं और युवा आते हैं, वहां के उपकरण महीनों से टूटे पड़े हैं। क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
नेताओं को केवल ‘वार्ड’ और ‘टिकट’ की चिंता
बीजेपी और कांग्रेस के स्थानीय नेता फिलहाल वार्डों के परिसीमन और पार्षद की टिकट के गणित में व्यस्त हैं। जनता की समस्याओं से किसी को कोई लेना-देना नहीं है। नेता याद रखें कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है और यह चुप्पी आने वाले समय में भारी पड़ सकती है।
सवाल सीधा है : क्या उदयपुर के जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि अपनी नींद त्यागकर गुलाबबाग की सुध लेंगे या इस ऐतिहासिक विरासत को पूरी तरह बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया जाएगा?
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