
नई दिल्ली/कोलकाता:
पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने न केवल बंगाल की सत्ता का समीकरण बदला है, बल्कि इसने ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के भीतर की आंतरिक शक्ति संरचना को भी पूरी तरह पुनर्गठित कर दिया है. सोमवार दोपहर तक यह साफ हो गया कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस 100 सीटों के आंकड़े तक पहुंचने के लिए भी संघर्ष कर रही है. इस हार ने भाजपा को “हिंदी हृदयस्थल” की पार्टी के लेबल से तो मुक्त किया ही है, लेकिन इसका सबसे गहरा प्रभाव विपक्षी खेमे में कांग्रेस के ‘एकमात्र नेतृत्व’ के रूप में उभरने पर पड़ेगा.
कांग्रेस के लिए ‘वरदान’ साबित होगी टीएमसी की हार?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ममता बनर्जी का पतन कांग्रेस के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद है. इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं:
चुनौती का अंत: ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने वाली सबसे मुखर नेता रही हैं. उनकी शक्ति कम होने का मतलब है कि अब गठबंधन में राहुल गांधी या कांग्रेस नेतृत्व को किसी ‘पैरेलल’ पावर सेंटर का सामना नहीं करना पड़ेगा.
नेतृत्व पर एकाधिकार: दिसंबर 2023 में जब ममता ने मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सुझाया था, तो इसे राहुल गांधी के प्रभाव को कम करने की चाल माना गया था. अब हार के बाद ऐसी चालें चलने की उनकी क्षमता सीमित हो जाएगी.
सहयोगियों का रुख: पूर्व में लालू यादव और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं ने भी ममता को नेतृत्व सौंपने के संकेत दिए थे. अब चुनावी विफलता के बाद क्षेत्रीय दल वापस कांग्रेस की धुरी की ओर झुकने को मजबूर होंगे.
बंगाल में ‘खोई जमीन’ पाने का मौका
ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामपंथियों को कमजोर करके ही अपनी राजनीतिक ताकत का विस्तार किया था. अब जब टीएमसी का किला ढह रहा है, तो कांग्रेस के पास राज्य में अपनी संगठनात्मक क्षमता को फिर से खड़ा करने का एक ऐतिहासिक अवसर है.
अति-महत्वाकांक्षा और पतन का दौर
टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी द्वारा कांग्रेस की विफलताओं (हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव) पर किए गए हमले और ममता को ‘विपक्ष का असली चेहरा’ बताने वाले बयानों ने गठबंधन में दरार पैदा की थी. ममता बनर्जी ने हाल ही में “दिल्ली पर कब्ज़ा” करने का आह्वान किया था, लेकिन अब अपनी ही ज़मीन खिसकने से उनकी राष्ट्रीय भूमिका पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है.
यह हार ममता बनर्जी के उस ‘विजयी फॉर्मूले’ के अंत का संकेत है, जिसे उन्होंने 2021 की जीत के बाद पेश किया था. अब इंडिया गठबंधन में शक्ति संतुलन पूरी तरह से कांग्रेस के पक्ष में झुक गया है, जिससे आने वाले समय में विपक्षी एकता का केंद्र बिंदु केवल दिल्ली (कांग्रेस मुख्यालय) रहने वाला है.
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