
उदयपुर। ब्रह्मपोल स्थित मशहूर दरगाह हज़रत इमरत रसूल बाबा परिसर में आयोजित हज़रत सूफ़ी नज़ीर साहब क़ादरी, चिश्ती, नूरी रहमतुल्लाह अलैह का दो दिवसीय सालाना उर्स पूरी अक़ीदत और एहतराम के साथ संपन्न हो गया। उर्स के अंतिम दिन मज़ार-ए-अक़्दस पर दुआ और कुल की मुक़द्दस रस्म अदा की गई, जिसमें ज़ायरीन और अक़ीदतमंदों का भारी जनसैलाब उमड़ पड़ा।
निवर्तमान पार्षद व सूफ़ी साहब के शैदाई हिदायत उल्ला ने बताया कि नागौर से विशेष रूप से तशरीफ़ लाए नामचीन सूफी गायक जावेद क़ादरी साहब एवं अन्य हज़रात ने एक से बढ़कर एक रूहानी सूफियाना कलाम पेश कर समां बांध दिया।
मज़हबी महफ़िल में पढ़े गए कुछ प्रमुख कलाम इस प्रकार रहे:
“कुछ नहीं मांगता शाहों से ये शैदा तेरा”
“दर्द सह कर भी तेरा नाम लिए जाते हैं, तेरे दीवाने तुझे याद किए जाते हैं”
“ये बात किस क़द्र हसीन जो कह गये मोईनुद्दीन, मेरा बादशाह हुसैन हैं”
महफ़िल के आख़िर में हज़रत अमीर ख़ुसरो का सुप्रसिद्ध और रूहानी कलाम “आज रंग है ऐ मां रंग है री, मेरे महबूब के घर रंग है री” पेश किया गया, जिसे सुनकर आस्ताने पर मौजूद तमाम अकीदतमंद झूम उठे।
मुल्क में अमन-चैन की दुआ और लंगर का आयोजन
सूफियाना महफ़िल के बाद मज़ार शरीफ पर अक़ीदत के फूल और चादर पेश कर फ़ातिहा ख़्वानी की गई। इस मुक़द्दस मौक़े पर हज़रत सूफ़ी निसार साहब बासनी ने बारगाहे-इलाही में हाथ फैलाकर पूरे मुल्क में आपसी भाईचारे, अमन-शांति, ख़ुशहाली और तरक्की के लिए विशेष दुआ करवाई। उन्होंने उर्स में शामिल हुए सभी ज़ायरीन और शहरवासियों को उर्स-ए-पाक की दिली मुबारकबाद भी पेश की।
समापन के अवसर पर दरगाह परिसर में बड़े स्तर पर ‘लंगर-ए-आम’ (तबर्रुक) का आयोजन किया गया, जहाँ हज़ारों की तादाद में आए जायरीनों को प्रसाद तक़सीम किया गया।
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