
उदयपुर। अंजुमन तालीमुल इस्लाम, उदयपुर द्वारा आयोजित जिला स्तरीय मुस्लिम प्रतिभा सम्मान समारोह “परवाज़” सुखाड़िया रंग मंच पर बेहद भव्यता के साथ संपन्न हुआ। इस गरिमामयी समारोह में शिक्षा, खेलकूद, दीनी तालीम और प्रशासनिक सेवाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले 350 से अधिक नौजवानों को सम्मानित किया गया। पूर्व जिला कलेक्टर ताराचंद मीणा, अंजुमन सदर मुख्तार कुरेशी और कई दानिशमंदों की मौजूदगी में बच्चों की हौसला-अफ़ज़ाई तो हुई, लेकिन इस भव्यता के बीच एक बेहद गंभीर और ज़मीनी हक़ीक़त भी उभरकर सामने आई—क्या सिर्फ एक ‘परवाज़’ से कौम का मुस्तकबिल सुधर जाएगा?
समारोह की चकाचौंध से इतर, आज कौम के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन भटके हुए नौजवानों को बचाने की है जो नशे और अपराध की दलदल में धंसते जा रहे हैं। कार्यक्रम के गहरे विज़न को टटोलें तो यह साफ़ होता है कि यह पहल एक शानदार शुरुआत ज़रूर है, लेकिन मंज़िल अभी बहुत दूर है।
चुनौती : भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लाना असली कामयाबी
समारोह में जहां एक तरफ डिग्रियों और ट्रॉफियों की गूंज थी, वहीं दूसरी तरफ समाज के प्रबुद्ध वर्ग का मानना था कि असली कामयाबी तब मिलेगी जब समाज के उस हिस्से तक पहुंचा जाए जो हाशिए पर है। जो नौजवान नशे की लत या गलत रास्तों पर मुफ़्तिला होकर अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हैं, उन्हें पहचानना और मुख्यधारा में वापस लाना अंजुमन और कौम की लीडरशिप के लिए असली इम्तिहान है। सही राह पर चलने वालों की पीठ थपथपाना जितना ज़रूरी है, उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी गर्त में जा रहे युवाओं का हाथ थामना है।
लीडरशिप को चुनने होंगे ‘कठिन रास्ते’
कौम की तरक्की का रास्ता सिर्फ आसान और बने-बनाए रास्तों से होकर नहीं गुज़रता। अब वक्त आ गया है कि सामाजिक लीडरशिप को ऐसे ‘कठिन और लीक से हटकर’ रास्ते चुनने होंगे, जहां से गुज़रना तो मुश्किल हो, लेकिन जहां पहुंचकर पीछे लौटने का कोई विकल्प न बचे। जब तक समाज का नेतृत्व इन कड़वी सच्चाइयों और ज़मीनी कठिनाइयों से रूबरू नहीं होगा, तब तक कौम के ‘अच्छे दिन’ लौटना नामुमकिन है।
“एक परवाज़ से मुस्तकबिल नहीं बदलेगा। यह महज़ एक आगाज़ है। समाज की असली तरक्की तब होगी जब हम हर उस नौजवान तक पहुंचेंगे जो भटकाव का शिकार है।”
अंजुमन का बड़ा विज़न: इंग्लिश मीडियम स्कूल की घोषणा
इसी कड़वी हक़ीक़त और भविष्य की ज़रूरतों को समझते हुए अंजुमन के सेक्रेट्री एडवोकेट मुस्तफा शेख ने अपने संबोधन में एक बड़ा और साहसिक कदम उठाया। उन्होंने उदयपुर में “अंजुमन तालीमुल इस्लाम इंग्लिश मीडियम स्कूल” शुरू करने की महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की। उन्होंने साफ किया कि आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही वह औज़ार है जो युवाओं को भटकाव से दूर रख सकती है। इसके लिए उन्होंने समाज के दानदाताओं, शिक्षाविदों और समाजसेवियों से एकजुट होकर सहयोग करने की अपील की।
समारोह की मुख्य झलकियां और कबीना का रिपोर्ट कार्ड
350+ प्रतिभाएं सम्मानित: प्रोफेशनल डिग्री धारकों, हाफ़िज़, आलिम, खिलाड़ियों और प्रशासनिक सेवाओं में चयनित युवाओं को ट्रॉफी व प्रशस्ति-पत्र दिए गए।
एक साल का लेखा-जोखा: अध्यक्षीय संबोधन में सदर मुख्तार कुरेशी ने नई कबीना के एक वर्ष पूर्ण होने पर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में किए गए कार्यों का विवरण रखा।
इस्तकबाल और परिचय: नायब सदर फारूक कुरेशी ने सभी का स्वागत किया, जबकि कोऑर्डिनेटर डॉ. सैयद इरशाद अली ने ‘परवाज़’ के मुख्य उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। Joint Secretary इज़हार हुसैन ने अंत में सभी का आभार जताया।
मंच संचालन: मोहम्मद आसिफ छीपा (कॉ-कोऑर्डिनेटर) एवं फिरोज बशीर ने बेहद शानदार अंदाज़ में कार्यक्रम की कमान संभाली।
इस ऐतिहासिक पल के गवाह मेहमान-ए-खुसूसी डॉ. वसीम खान, इकराम कुरेशी, अब्दुल क़दीर खान, असरार अहमद, हाजी असलम रंगवाला, शकील हुसैन, लायक अली खान और सराफत खान बने। साथ ही शहर काजी हामिद रज़ा, मुफ्ती अहमद हुसैन, मौलाना सोबदार आलम, हाफिज आज़म रिज़वी सहित अंजुमन कैबिनेट के तनवीर चिश्ती, एडवोकेट मोहम्मद शहज्जाद, तोकिर रज़ा, अनीस रज़ा, अनीस अब्बासी, फकरुद्दीन शेख, मोहम्मद इरशाद, एडवोकेट आदिल और जनरल हाउस के मेम्बरान ने शिरकत की।
‘परवाज़’ समारोह की भव्यता और 350 से अधिक बच्चों की कामयाबी अपनी जगह बेहद सराहनीय है, लेकिन इस भव्य मंच पर सजे ‘मेहमानों के गुलदस्ते’ ने एक नए और कड़वे विमर्श को भी जन्म दे दिया है। समारोह में पूर्व नौकरशाहों से लेकर सियासी रसूख रखने वाले चेहरों और समाजसेवियों की एक लंबी जमात मौजूद थी। लेकिन अब समाज के भीतर से ही यह गंभीर सवाल उठने लगा है कि मंच पर आसीन इन खास मेहमानों का कौमी भलाई में खुद का क्या योगदान है? क्या इन्होंने वाकई कौम की बेहतरी के लिए कोई ठोस काम किया है, या फिर कौम की इन जमीनी उपलब्धियों और भीड़ को अपनी सियासी व व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए महज़ एक ‘सीढ़ी’ की तरह इस्तेमाल किया है?
कौम के जागरूक तबके का मानना है कि अब समय आ गया है जब ऐसे मंचों पर बुलाए जाने वाले अतिथियों का भी निष्पक्ष आंकलन होना चाहिए।
शिक्षाविदों की मौजूदगी में शिक्षा पर बड़ी बातें हुईं। समीक्षा इस बात की भी होनी चाहिए कि क्या ऐसे बड़े शैक्षणिक संस्थानों के दरवाजे कौम के उन गरीब और पिछड़े बच्चों के लिए भी रियायती दरों पर खुलते हैं, जो आर्थिक तंगी के कारण उच्च शिक्षा से महज़ एक कदम दूर रह जाते हैं?
कौम को अब ‘जुमले’ नहीं, ‘जवाबदेही’ चाहिए
अंजुमन तालीमुल इस्लाम इंग्लिश मीडियम स्कूल जैसी ऐतिहासिक और महत्वाकांक्षी योजना की नींव रखने जा रहा है, जिसके लिए समाजसेवियों और दानदाताओं से सहयोग मांगा गया है। ऐसे में समाजसेवियों को भी अब सिर्फ मुख्य अतिथि की कुर्सी पर बैठकर तालियां बटोरने के बजाय यह साबित करना होगा कि इस बड़ी शैक्षणिक परियोजना में उनकी तरफ से क्या ठोस और व्यावहारिक मदद पहुंचती है।
एक अच्छी शुरुआत (‘परवाज़’) हो चुकी है, लेकिन कौम का मुस्तकबिल तब तक नहीं सुधरेगा जब तक हम अपने रहनुमाओं और मेहमानों की ‘जवाबदेही’ तय नहीं करेंगे। कौम को अब मंच से दी जाने वाली नसीहतों और जुमलों की ज़रूरत नहीं है। नेतृत्व और अतिथियों को यह समझना होगा कि कौम का मंच उनके निजी हितों की पूर्ति का साधन नहीं है। अगर वे मंच पर आकर कौम की तरक्की का रास्ता तालीम और एकता को बताते हैं, तो समाज अब उनसे यह हिसाब भी मांगेगा कि इस रास्ते पर वे खुद कितने कदम आगे बढ़े हैं। जब तक मेहमानों के दावों और उनके कर्मों का फासला कम नहीं होगा, तब तक अच्छे दिनों की उम्मीद बेमानी है।
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