सराहनीय कदम पर रोजी-रोटी का संकट : पुलिस साए में हटा मुखर्जी चौक का सब्जी बाजार, विस्थापन नीति पर उठे सवाल

फोटो जर्नलिस्ट : कमल कुमावत

उदयपुर। शहर के हृदय स्थल मुखर्जी चौक स्थित सब्जी मार्केट के बाहर सालों से बैठकर अपना व्यापार करने वाले फल-सब्जी विक्रेताओं और महिला व्यापारियों को गुरुवार सुबह भारी पुलिस जाब्ते के बीच वहां से हटा दिया गया। नगर निगम द्वारा की गई इस औचक और बड़ी कार्रवाई के बाद अब इन सभी दुकानदारों को शाहपुरा सब्जी मार्केट में शिफ्ट किए जाने की योजना है।

प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह एक ऐतिहासिक और सराहनीय कदम है। पिछले तीस वर्षों से इस बेहद व्यस्त और संवेदनशील क्षेत्र से अतिक्रमण और अस्थाई दुकानों को हटाने के प्रयास किए जा रहे थे। इस लंबे अंतराल में कई बड़े व्यापारी पहले ही सवीना सब्जी मंडी में स्थानांतरित हो चुके थे, लेकिन मुख्य सड़क पर लगने वाला यह बाजार यातायात और सुरक्षा के लिहाज से हमेशा एक बड़ी चुनौती बना हुआ था। इस लिहाज से नगर निगम की यह कार्रवाई शहर की व्यवस्था को सुधारने और इस संवेदनशील इलाके को जाम से मुक्ति दिलाने की दिशा में एक बड़ी कामयाबी है, जिसकी चौतरफा वाहवाही होना स्वाभाविक है।

सराहना के पीछे छिपा दर्द : छोटे व्यापारियों के साथ कितना न्याय?

प्रशासनिक सफलता की इस चकाचौंध के पीछे एक स्याह और आलोचनात्मक पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस बाजार को उजाड़ते वक्त यह भूल जाना कि यहां सालों से बैठने वाले छोटे व्यापारियों की आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित होगी, व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है।

सबसे खास और विचारणीय बात यह है कि मुखर्जी चौक के बाहर फुटपाथ पर बैठकर फल-सब्जी बेचने वालों में बहुसंख्यक आबादी उन गरीब महिलाओं की है, जो रोज़ कमाकर अपने पूरे परिवार का भरण-पोषण करती हैं। बिना किसी पुख्ता और सुव्यवस्थित वैकल्पिक रोजगार स्थल के इन्हें अचानक हटा देना इन महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण पर एक बड़ा प्रहार है।

प्रशासन ने इन्हें शाहपुरा सब्जी मार्केट में शिफ्ट करने का फरमान तो सुना दिया है, लेकिन क्या वह नया स्थान इन छोटे वेंडर्स के लिए व्यापारिक रूप से व्यावहारिक है? क्या वहां इन्हें तुरंत रोजगार का सही माहौल मिल पाएगा? यदि नगर निगम इन रेहड़ी-पटरी वालों को ग्राहकों की सुलभ पहुंच वाली सही जगह और बुनियादी सुविधाएं नहीं दे पाता है, तो शहर को सुंदर और सुरक्षित बनाने की यह कार्रवाई इन लाचार परिवारों के साथ घोर अन्याय साबित होगी।

सुधार की सराहना निश्चित रूप से होनी चाहिए, लेकिन विकास की वेदी पर सबसे कमजोर तबके की रोजी-रोटी की बलि चढ़ाना किसी भी लोककल्याणकारी शासन व्यवस्था के लिए आलोचना का विषय है। सरकार और निगम को वाहवाही लूटने के साथ-साथ इन महिला व्यापारियों के पुनर्वास को पूरी संवेदनशीलता के साथ प्राथमिकता देनी होगी।

 

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