
पेपर लीक के मामले में देशभर में चल रहे इस ताज़ा आंदोलन को ही देख लीजिए। जैसा कि हमारे देश में अब एक अलिखित नियम बन चुका है—समाज फिर दो साफ-सुधरे, धारदार हिस्सों में बंट गया है। एक पक्ष में है, दूसरा विपक्ष में। बीच में खड़े होने या तटस्थ रहने की गुंजाइश को समाज ने पूरी तरह से समाप्त कर दिया है।
अब गणित एकदम सीधा और बेरहम है-अगर आप आंदोलन के समर्थन में बोले— तो तुरंत आपके माथे पर ‘टूलकिट’, ‘विदेशी फंडिंग’, ‘देशद्रोही’, ‘अराजक’ और ‘भाड़े का टट्टू’ जैसे न जाने कितने भारी-भरकम तमगे चिपका दिए जाएंगे।
और अगर आपने आंदोलन के विरोध या खामियों पर बात की— तो दूसरी तरफ की टोली तैयार बैठी है। वे आपको पलक झपकते ही ‘गोदी’, ‘डरपोक’, ‘गुलाम’, ‘बिकाऊ’ और ‘सत्ता का चारण’ घोषित कर देंगे।
अब आप ही बताइए, इंसान बोले तो किधर बोले?
सबसे सुरक्षित रास्ता यही लगता है कि चुप रहो। खामोश रहकर तमाशा देखो। या फिर वही करो जो आजकल सबसे ज्यादा फैशन में है—अकेले में अपने ‘मन की बात’ कर लो। क्योंकि देखा जाए तो देश में जो लोग मन की बात कर रहे हैं, वे भी असल में अपने ही मन से बात कर रहे हैं; जनता की किसे पड़ी है!
अन्ना आंदोलन से केजरीवाल तक : वो एक पुराना धोखा
यह चुप्पी यूं ही नहीं आई है। इसके पीछे दशकों का अनुभव और आघात है।
याद कीजिए अन्ना आंदोलन का वह दौर! तब देश का आम आदमी, युवा और मध्यम वर्ग बड़े जोश के साथ खड़ा हुआ था। हम भी बोले थे—अरविंद केजरीवाल और उनकी क्रांति की तरफ। लगा था कि देश में कोई नया सवेरा होने वाला है। लेकिन फिर क्या हुआ?
दस साल तक दिल्ली की सत्ता पर राज करने वाले मुख्यमंत्री ने मुड़कर कभी उन आम लोगों की तरफ नहीं देखा जो उस चिलचिलाती धूप में उनके साथ खड़े थे। जो लोग आंदोलन की आत्मा थे, जो सबसे करीब थे, वे एक-एक करके किनारे कर दिए गए या खुद दूर चले गए। जिस पार्टी ने कांग्रेस और बीजेपी को दिन-रात गालियां देकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की, वह सहूलियत के हिसाब से कभी बीजेपी के पीछे तो कभी कांग्रेस के गलबांहों में दिखाई दी।
जब तक लगा कि गेंद अपने पाले में है, तब तक “अपनी ढपली, अपना राग” बजता रहा। ऐसे नए-नवेले नेता कल तक कांग्रेस को लाचार और बीती बात समझ रहे थे। लेकिन राजनीति का चक्र देखिए, आज वही कांग्रेस इनके लिए ‘अचार’ बन चुकी है!
अब हालत यह है कि इनकी सियासत की थाली में बिना इस ‘अचार’ (कांग्रेस) के कोई स्वाद ही नहीं आ रहा। फिर भी त्रासदी देखिए—अचार की चटपटी जरूरत के बावजूद ये उसे लाचार ही साबित करने पर तुले हैं। जब देखते हैं कि जनता का रुख थोड़ा अचार की तरफ झुक रहा है, तो ये खुद मजबूर और बेचैन दिखने लगते हैं। इनकी पूरी रणनीति बस यही है कि किसी तरह बिना अचार के ही काम चल जाए, ताकि वे खुद सबसे बड़े ‘अचार’ (स्वाद) बन बैठें और पुराने खिलाड़ी को हमेशा के लिए लाचार बनाकर रख दें।
न इधर के, न उधर के: खामोशी ही असली ताकत है
बहरहाल, अपनी सीधी सी गणित है—न कांग्रेस, न बीजेपी, न कोई तीसरा विकल्प। अपने लिए तो बस ‘खामोशी’ ही सबसे बड़ा आसरा है।
राजनीति में न हमें चुनाव लड़ना है, न झंडे उठाने हैं और न ही किसी नेता की जय-जयकार करनी है। हां, लेकिन इस व्यवस्था के ‘बीच’ में रहना जरूर है। रहना इसलिए है ताकि आंखें खुली रहें और कान सतर्क। ताकि हम देख सकें कि पर्दे के पीछे क्या पक रहा है, सुन सकें कि कौन कितना सफेद झूठ बोल रहा है, और वक्त आने पर अपने विवेक से सही का चयन कर सकें।
आजकल तो भक्ति में लीन रहने वाले अधिकांश ‘कट्टर समर्थकों’ का ध्यान भी अचानक भंग हो गया है। वे भी अब एक नया ‘ध्यान’ (मेडिटेशन) कर रहे हैं—यह नापने का ध्यान कि हवा का रुख किधर है और किस का पलड़ा भारी है! ताकि सही समय रहते बिना किसी शर्म के पलटी मारी जा सके।
लेकिन ज़माना बदल चुका है। यह ‘कॉकरोच दौर’ है!
अगर पलटी मारने का आकलन जरा सा भी गलत बैठा और आप पीठ के बल गिर पड़े, तो कॉकरोच की तरह उलटे लटक जाएंगे। और याद रखिएगा, एक बार जब आप इस राजनीति की नाली में उलटे गिर गए, तो फिर सीधे होने के लिए न तो किसी का ‘हाथ’ काम आने वाला है और न ही किसी की ‘झाड़ू’!
इसलिए भाई, अपनी तो सीधी बात है—”हम तो किधर भी नहीं बोल रहे… हम बस देख रहे हैं!”
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