मैं जिलाध्यक्ष, मैं महामंत्री, मैं पार्षद और मैं ही मेयर! निकाय चुनाव में BJP पदाधिकारियों की सर्वव्यापी दावेदारी पर उठे सवाल

उदयपुर। नगरीय निकाय चुनावों की हलचल अब सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप ग्रुपों से निकलकर सीधे धरातल और सड़कों पर नजर आने लगी है। चुनावी तारीखों के नजदीक आते ही टिकट के दावेदारों की होड़ तेज हो गई है। इसी बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सियासी गलियारों में एक खास मुहावरा तेजी से चर्चा का विषय बन गया है—’मैं हूं ना!’

दरअसल, संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे कई पदाधिकारी खुद ही पार्षद और फिर मेयर पद की दावेदारी ठोक रहे हैं। संगठन के जिम्मेदार चेहरों की इस ‘सर्वव्यापी’ महत्वाकांक्षा ने पार्टी के भीतर ही अंतर्कलह और असंतोष के सुर मुखर कर दिए हैं।

सब चुनाव लड़ेंगे तो संचालन कौन करेगा?

इस मुद्दे पर पार्टी के वरिष्ठ नेता मांगीलाल जोशी ने मुखर होते हुए संगठन की कार्यप्रणाली और चुनावी नियमों पर सीधे सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि पार्टी में जिलाध्यक्ष, महामंत्री और अन्य प्रमुख पदों पर बैठे नेता ही टिकट की कतार में खड़े हो जाएंगे, तो फिर संगठन का काम कौन संभालेगा और चुनाव का संयोजन व संचालन कौन करेगा?

वरिष्ठ नेता ने रखे कड़े नियम तय करने के सुझाव

पार्टी में टिकट वितरण को लेकर बन रही असहज स्थिति और संभावित अफरा-तफरी को रोकने के लिए वरिष्ठ स्तर से कुछ स्पष्ट और सख्त दिशा-निर्देश तय करने की मांग रखी गई है:

दावेदारी से पहले पद से इस्तीफा: संगठन में पद पर रहते हुए टिकट की मांग करने वाले पदाधिकारियों को पहले अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए। इसके बाद पार्टी हाईकमान स्वतंत्र रूप से यह तय करे कि उन्हें चुनावी मैदान में उतारा जाए या नहीं।

‘दो-तीन बार’ वालों को विश्राम: जो नेता पहले ही दो या तीन बार चुनाव लड़ चुके हैं, उन्हें अब विश्राम देकर नए और समर्पित कार्यकर्ताओं को मौका मिलना चाहिए ताकि संगठन में युवाओं और सक्रिय कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहे।

स्थानीयता को प्राथमिकता (वार्ड का ही प्रत्याशी): जिस वार्ड का जो मूल निवासी या स्थानीय सक्रिय कार्यकर्ता है, टिकट केवल उसी को दिया जाए। बाहरी या अन्य वार्डों के दावेदारों को थोपने की परंपरा बंद होनी चाहिए।

नियम नहीं बने तो भुगतना पड़ सकता है सियासी नुकसान

पार्टी के अंदरूनी हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि यदि समय रहते संगठन और टिकट दावेदारी के बीच स्पष्ट लक्ष्मण रेखा नहीं खींची गई, तो चुनाव में आंतरिक खींचतान और अव्यवस्था का माहौल बन जाएगा। वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का मानना है कि जमीनी स्तर पर वर्षों से पसीना बहा रहे सामान्य कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर यदि पदों पर काबिज नेताओं को ही हर जगह आगे किया गया, तो निकाय चुनाव में इसका सीधा नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है।

 

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