फोटो जर्नलिस्ट : कमल कुमावत

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर।
उदयपुर की सियासत में इन दिनों जो घट रहा है, वह सिर्फ 80 वार्डों के पार्षदों को चुनने का औपचारिक अनुष्ठान नहीं है। असल कहानी तो उस पर्दे के पीछे बुनी जा रही है जहां संघ के पुराने सिपहसालार, दिल्ली के सत्ता-गलियारों की खामोश धमक और स्थानीय जनआकांक्षाओं का एक विचित्र संगम तैयार हो रहा है। वार्ड नंबर 45 के अखाड़े में भारतीय जनता पार्टी ने जिस चेहरे को उतारा है—दिनेश भट्ट—वह कोई साधारण पार्षद प्रत्याशी नहीं हैं। वे अपने पूरे राजनीतिक जीवन में पहली बार मतपेटियों की सीधी परीक्षा में उतरे हैं, मगर उनके उतरते ही उदयपुर की चुनावी फिजा का तापमान अचानक कई डिग्री चढ़ गया है। समर्थकों के चेहरों पर चमक है और विरोधियों के खेमे में अघोषित सन्नाटा।
दिनेश भट्ट ने अपनी जुबान से कभी यह नहीं कहा कि वे शहर के अगले प्रथम नागरिक यानी मेयर बनना चाहते हैं। लेकिन राजनीति में जो कहा नहीं जाता, वही सबसे ज्यादा गूंजता है। शहर के चौक-चौराहों से लेकर सोशल मीडिया के डिजिटल चौपालों तक—उदयपुर की जनता उन्हें पहले से ही मेयर मानकर बैठी है। ऑनलाइन सर्वेक्षणों में उनका नाम शीर्ष पर तैर रहा है। सामने कांग्रेस के पंकज सुखवाल हैं—युवा, आक्रामक और कभी भाजपा के ही कैडर का हिस्सा रहे नेता। सुखवाल अपनी पूरी ताकत से मुकाबले को कांटे का बनाने में जुटे हैं, पर भट्ट की मौजूदगी ने इस वार्ड को शहर की सबसे वीआईपी सीट में तब्दील कर दिया है।

मूलतः शिक्षक रहे दिनेश भट्ट का मिजाज उस पुराने दौर के संघी कार्यकर्ताओं जैसा है जो दशकों तक पर्दे के पीछे रहकर सरकारें बनाते और गिराते रहे, मगर खुद कभी सत्ता के पहले पायदान पर बैठने की जल्दबाजी नहीं दिखाई। जिस कद के वे नेता रहे हैं, उन्हें विधायक, सांसद या मेयर का टिकट बरसों पहले मिल जाना चाहिए था। मगर राजनीति में सब्र भी एक बहुत बड़ा हथियार होता है। जब उनसे किसी ने पूछा कि बतौर शिक्षक उनकी सबसे बड़ी पूंजी क्या है, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शालीन काबरा का नाम लिया। ऐसे सैकड़ों नाम हैं जो आज देश के सत्ता-तंत्र में निर्णायक कुर्सियों पर बैठे हैं और कभी भट्ट साहब की क्लास में ककहरा सीखते थे।
वार्ड 45 केवल उनका चुनावी क्षेत्र नहीं, उनका आशियाना है। वे किसी सरकारी पद के मोहताज कभी नहीं रहे। लोग तो दबी जुबान में कहते हैं कि भट्ट साहब खुद अपने आप में एक ‘ट्रिपल इंजन’ की सरकार हैं। केंद्र में बैठे मंत्रियों से लेकर जयपुर में मुख्यमंत्री की टेबल तक और स्थानीय सांसद-विधायक से उनके तार इतने सहज जुड़े हैं कि जहां आम पार्षदों की फाइलें दम तोड़ देती हैं, वहां इनका एक फोन कॉल काम करा देता है। अपने वार्ड की एक पूरी कच्ची बस्ती का कायाकल्प कर उसे स्लम की श्रेणी से बाहर निकलवाना, पट्टे दिलाना और गैस पाइपलाइन बिछवाना—यह सब उन्होंने बिना किसी सरकारी ठप्पे के कर दिखाया।

शहर को लेकर उनका अपना एक स्पष्ट, परिपक्व नजरिया है। झीलों में गिरते गंदे नाले, बेतरतीब ट्रैफिक, पर्यटकों के लिए नाइट बाजार और सीवरेज की उलझी गुत्थियों पर उनके पास कागजी नहीं, व्यावहारिक समाधान हैं। वे बोलते हैं तो पूरी गहराई और सधी हुई भाषा में, मगर उससे भी ज्यादा वे सामने वाले को धैर्य से सुनते हैं। गुजरात के अस्पतालों में इलाज के लिए भटकते गरीब मरीजों के लिए एंबुलेंस से लेकर डॉक्टरों के पर्चों तक का बंदोबस्त पर्दे के पीछे रहकर करना उनकी रोजमर्रा की आदत का हिस्सा रहा है।
एक दिलचस्प बात यह भी कि उनकी कद-काठी और चेहरा-मोहरा बहुत कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मेल खाता है। उनके करीबी अक्सर इस बात पर चुटकी लेते हैं, जिसे वे एक हल्की मुस्कान के साथ टाल जाते हैं। अब सवाल यह है कि क्या उदयपुर का यह शिक्षक अपनी पहली चुनावी परीक्षा को जीतकर उस कुर्सी तक पहुंचेगा जिसके कयास पूरा शहर लगा रहा है, या फिर राजनीति का ऊंट किसी दूसरी करवट बैठेगा? फैसला ईवीएम के गर्भ में है, पर बिसात पूरी बिछ चुकी है।
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