राजस्थान विद्यापीठ : अखबार में छपे आरोपों पर कुलाधिपति और कुलपति का तीखा पलटवार, पूर्व वीसी को ठहराया आर्थिक तंगी का जिम्मेदार

प्रेस कांफ्रेंस से फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत

उदयपुर। जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) में कॉलेज शिक्षा निदेशालय की जांच रिपोर्ट, सरकारी अधिग्रहण की सिफारिश और ‘भंवरलाल राज’ शीर्षक से प्रकाशित खबरों को लेकर संस्थान प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। शनिवार को आयोजित संयुक्त प्रेस वार्ता में संस्थान के कुलाधिपति (कुलप्रमुख) भंवर लाल गुर्जर और कुलपति प्रो. मंजू मांडोत ने समाचार पत्र में छपे सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे विद्यापीठ की छवि धूमिल करने का सुनियोजित षड्यंत्र करार दिया।

कुलाधिपति ने स्पष्ट किया कि जांच में शामिल अधिकारियों ने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर मातृ संस्था की जांच की और तथ्यों को नजरअंदाज किया। उन्होंने संस्थान के गंभीर आर्थिक संकट का ठीकरा पूर्व कुलपति के कार्यकलापों पर फोड़ा।

छपे आरोपों का बिंदुवार खंडन : कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर का पक्ष

मातृ संस्था की जांच नियमों के विरुद्ध : कुलाधिपति ने कहा कि पिछले दिनों कॉलेज शिक्षा निदेशालय का जो जांच दल आया था, उसने विश्वविद्यालय के साथ-साथ मातृ संस्था की भी जांच कर डाली, जो पूरी तरह नियमों के विपरीत है। जांच के दौरान संस्था द्वारा सौंपे गए कई अहम दस्तावेजों और साक्ष्यों को जानबूझकर रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया।

संस्थान को मजबूत किया, लूटा नहीं : अपने ऊपर लगे वित्तीय आरोपों को नकारते हुए गुर्जर ने कहा, “मैं 2012 से मातृ संस्था की मैनेजमेंट कमेटी में हूं। पहले विश्वविद्यालय मातृ संस्था को सहायता देता था, लेकिन मेरे आने के बाद मातृ संस्था ने 4.5 करोड़ रुपये की नई संपत्ति खरीदी और विश्वविद्यालय को 9.5 करोड़ रुपये की मदद दी।”

बेटे प्रवीण गुर्जर की नियुक्ति पर सफाई : संगठन सचिव पद पर प्रवीण गुर्जर के चयन को उन्होंने विधिसम्मत बताते हुए कहा कि यह पदोन्नति विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) के माध्यम से हुई है। जहां तक उनकी डिग्री या दस्तावेजों की जांच का सवाल है, वह तत्कालीन वाइस चांसलर (पूर्व कुलपति) की जिम्मेदारी थी, जिसे अब बेवजह तूल दिया जा रहा है।

पूर्व वीसी को हटाने पर मिली थीं धमकियां : गुर्जर ने खुलासा किया कि पूर्व कुलपति को संस्था के हित में पद से हटाया गया था। इस दौरान उन्हें न हटाने के लिए कई तरह के दबाव और धमकियां तक दी गई थीं, लेकिन उन्होंने कार्यकर्ताओं के हितों को प्राथमिकता देते हुए कठोर फैसला लिया।

‘पूर्व कुलपति की अवैध नियुक्तियों और अतिरिक्त सीटों से बिगड़े हालात’

प्रेस वार्ता में कुलाधिपति ने पूर्व कुलपति के कार्यकाल पर गंभीर सवाल उठाते हुए जांच कमेटी के गठन की घोषणा की:

चहेतों को उपकृत करना और अवैध भर्तियां : पूर्व कुलपति ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए कई अवैध नियुक्तियां कीं। अपने खास लोगों को बिना किसी नियमावली के भारी-भरकम भत्ते व एडवांस बांटे गए और कई लोग घर बैठे वेतन उठाते रहे।

नियम विरुद्ध अधिक सीटों पर दाखिले : वित्तीय लाभ के लिए विभिन्न पाठ्यक्रमों में स्वीकृत सीटों से अधिक सीटों पर दाखिले दिए गए। इन सभी घपलों की निष्पक्ष जांच के लिए कमेटी बना दी गई है और जल्द कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसी कानूनी कार्रवाई के डर से पूर्व कुलपति अपने मीडिया संपर्कों का दुरुपयोग कर भ्रामक खबरें छपवा रहे हैं।

36 करोड़ का दावा निकला खोखला : कुलपति प्रो. मंजू मांडोत

विश्वविद्यालय की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करते हुए कुलपति प्रो. मंजू मांडोत ने वित्तीय तंगी का ब्योरा रखा:

वेतन संकट : विद्यापीठ की माली हालत इस कदर खराब है कि कर्मचारियों को अगस्त माह का वेतन भी अत्यंत मुश्किल से जारी किया जा सका है।

फंड की हकीकत : प्रो. मांडोत ने बताया कि पूर्व कुलपति ने एक बैठक में दावा किया था कि संस्थान के पास 36 करोड़ रुपये हैं। लेकिन जब आंतरिक पड़ताल की गई, तो सामने आया कि इसमें से 19 करोड़ रुपये पर तो बैंक ऋण (लोन) ले रखा है और शेष 17 करोड़ रुपये मात्र ‘कॉरपस फंड’ है।

यूजीसी नियमों की अनदेखी : उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के तहत संस्थान का कॉरपस फंड न्यूनतम 25 करोड़ रुपये होना अनिवार्य है, जो कि वर्तमान में पूरा नहीं है।

संस्थान प्रशासन ने साफ कर दिया है कि कर्मचारियों और विद्यापीठ के स्वाभिमान से खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और दुर्भावनापूर्ण खबरों के खिलाफ कानूनी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।

 

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