
सैयद हबीब/ कमल कुमावत, उदयपुर
सिनेमा के सुनहरे दौर में जब के. आसिफ ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का शीशमहल सजा रहे थे, तो उनका मक़सद सिर्फ़ एक भव्य सेट खड़ा करना नहीं था; वे दरअसल उस परदे पर एक ऐसा तिलिस्म रचना चाहते थे जिसे देखकर दर्शक अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की थकान भूलकर किसी दैवीय सम्मोहन में डूब जाए। आस्था का रंगमंच भी बहुत कुछ सेल्युलाइड के उस जादू जैसा ही होता है। हर साल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के आते ही जब मुंबई के परेल और लालबाग की तंग गलियों में ‘लालबाग चा राजा’ के दरबार का परदा उठता है, तो लगता है कि पूरी मायानगरी अपनी तमाम दौड़-धूप छोड़कर एक चौखट पर नतमस्तक हो गई है।
अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि मुंबई के इस तिलिस्मी रूपहले परदे का एक जीवंत अक्स इन दिनों झीलों की नगरी उदयपुर में भी उसी शिद्दत के साथ उतर आया है।
लेकसिटी के बापू बाज़ार की रौनक देखिए। वहां कदम रखते ही यह भ्रम होने लगता है कि क्या हम अरावली की शांत वादियों में हैं या फिर गिरगांव-चौपाटी की किसी गुलज़ार नुक्कड़ पर? बापू बाज़ार में विराजे ‘उदयपुर चा राजा’ के दर पर उमड़ता आस्था का यह रेला किसी भव्य फिल्म के पहले दिन, पहले शो (First Day, First Show) की उस लंबी कतार जैसा है, जिसकी कोई अंतिम छोर नज़र नहीं आती। फर्क सिर्फ़ इतना है कि यहां टिकट की खिड़की नहीं, बल्कि श्रद्धा के नारियल और मोदक के थाल सजे हैं।

राजकपूर साहब अपनी फ़िल्मों में रोशनी और रंगों की छटा (Light and Shade) के इस्तेमाल के उस्ताद थे। ‘उदयपुर चा राजा’ के इस भव्य पांडाल में भी कारीगरों ने कुछ वैसा ही कमाल दिखाया है। गणपति बप्पा के विग्रह पर रोज़ाना की जाने वाली नयनाभिराम आंगी—कभी स्वर्ण आभा में लिपटी, तो कभी मखमली रंगों के संयोजन में ढली—भक्तों की आंखें चौंधिया देती है। पांडाल की स्थापत्य कला और सजावट किसी महँगे स्टूडियो के भव्य सेट को भी मात देती है।
लेकिन इस पूरे कार्यक्रम की असली रूह सिर्फ़ बापू बाज़ार के उस विशाल पांडाल में नहीं, बल्कि शहर के गली-मोहल्लों में सांस ले रही है। पुराने शहर के तंग रास्तों से लेकर नई बस्तियों तक, हर चौराहे पर बप्पा के छोटे-बड़े पंडाल सजे हैं। ढोल-ताशों की गूंजती थाप और धूप-अगरबत्ती की महक में उदयपुर का मिज़ाज पूरी तरह मुंबईया रंग में रंग चुका है।
परदे पर जब कोई महान फ़िल्म चलती है, तो उसका असर केवल तालियों तक सीमित नहीं रहता; वह इंसानों के दिलों को एक सूत्र में पिरो देती है। गणेश उत्सव का यह पर्व भी लेकसिटी के लिए उसी सामूहिक संवेदना का उत्सव है। जहां हर कोई अपनी व्यक्तिगत चिंताएं, राजनीतिक खींचतान और जीवन की उलझनों को बाहर छोड़कर, बप्पा के मुस्कुराते चेहरे के सामने खुद को सौंप देना चाहता है। परदा गिरता है, आरती की लौ उठती है और बापू बाज़ार का यह विशाल कैनवास साबित करता है कि आस्था जब परवान चढ़ती है, तो मुंबई और उदयपुर के बीच का फ़ासला महज़ एक ख़्याल बनकर रह जाता है।
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