
उदयपुर। लेकसिटी के अस्सी वार्डों के सदन में गणित की सामान्य नजर से देखें तो 53 पार्षदों वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का पलड़ा भारी दिखता है और 23 सीटों वाली कांग्रेस दूर-दूर तक मुकाबले में नजर नहीं आती। लेकिन सियासत में जब बंद लिफाफे और ‘सीक्रेट बैलेट’ (गुप्त मतदान) की तलवार लटकती है, तो अंकगणित के नियम अक्सर धरे के धरे रह जाते हैं। शुक्रवार शाम कांग्रेस के सभी 23 पार्षदों और दो समर्थक निर्दलीयों का अचानक अज्ञात रिसॉर्ट में कूच कर जाना केवल खुद को बचाने की कवायद नहीं है, बल्कि शहर कांग्रेस जिलाध्यक्ष फतेहसिंह राठौड़ और उनकी पार्षद पत्नी व महापौर प्रत्याशी पूनम कुंवर द्वारा रची गई एक सोची-समझी आक्रामक रणनीति का पहला चरण है।
पूनम कुंवर की उम्मीदवारी और फतेहसिंह का दांव
कांग्रेस ने जब पूनम कुंवर को महापौर पद का चेहरा बनाया, तो सियासी हलकों में इसे केवल एक औपचारिकता माना जा रहा था। लेकिन परदे के पीछे की कहानी कुछ और ही बयां करती है:
राजपूत कार्ड और सर्वमान्य स्वीकार्यता : पूनम कुंवर को आगे कर कांग्रेस ने शहर के प्रभावी सामाजिक समीकरणों को सीधे तौर पर साधा है। भाजपा में जहां वैश्य (पारस सिंघवी), ब्राह्मण (दिनेश भट्ट) और सिंधी/अन्य वर्गों के बीच तीखा टकराव देखने को मिला, वहीं कांग्रेस ने एक ऐसा चेहरा पेश किया जो सदन में मौजूद विभिन्न खेमों के असंतुष्ट पार्षदों के लिए स्वीकार्य विकल्प बन सके।
फतेहसिंह राठौड़ की आक्रामक फील्डिंग : शहर जिलाध्यक्ष फतेहसिंह राठौड़ ने नामांकन के दिन से ही भाजपा के अंदरूनी कलह को भांप लिया था। कटारिया खेमे (विधायक ताराचंद जैन व दिनेश भट्ट) और प्रदेश संगठन (गजपाल सिंह व प्रमोद सामर) के बीच की दरार को कांग्रेस ने एक अवसर के तौर पर देखा। फतेहसिंह का सीधा आकलन है कि पारस सिंघवी के नाम पर भाजपा के कम से कम 10 से 15 पार्षद दिल से सहमत नहीं हैं।
सेंधमारी का डर और तुरंत पुलिस एक्शन : शुक्रवार को जब खबर उड़ी कि भाजपा के एक पूर्व पार्षद ने कांग्रेस खेमे के 2-3 पार्षदों से संपर्क साधने की कोशिश की है, तो कांग्रेस ने रक्षात्मक होने के बजाय पहले पुलिस के समक्ष दबाव बनाने का ज्ञापन सौंपकर नैतिक बढ़त ली और फिर बिना एक पल गंवाए अपने कुनबे को शहर से दूर ले जाकर ‘सील्ड’ कर दिया।
कांग्रेस के 23+2 का गणित : कहां से आएंगे बाकी 16 वोट?
उदयपुर नगर निगम में बहुमत का जादुई आंकड़ा 41 है। कांग्रेस के पास अपने 23 और 2 निर्दलीय मिलाकर कुल 25 का आधार है, यानी जीत के लिए पार्टी को 16 अतिरिक्त वोटों की दरकार है। इस खाई को पाटने के लिए फतेहसिंह और उनकी कोर टीम ने तीन-स्तरीय चक्रव्यूह तैयार किया है।
पहले घेरे में दिनेश भट्ट समर्थक (कटारिया गुट) को लक्षित किया गया है, जहां भट्ट को ऐन वक्त पर किनारे किए जाने के बाद उनके समर्थक पार्षदों में भारी रोष है, कांग्रेस इसी नाराजगी को ‘अंतरात्मा की आवाज’ में बदलने की जुगत में है। दूसरे घेरे में प्रमोद सामर समर्थक आते हैं, जहां सामर को टिकट न मिलने से उनके नजदीकी पार्षदों का एक वर्ग भी नए नेतृत्व से असहज महसूस कर रहा है, और कांग्रेस गुप्त मतदान का लाभ उठाकर इन्हें निष्क्रिय करने या क्रॉस वोटिंग के लिए साध रही है। वहीं तीसरे घेरे में अन्य निर्दलीय (2 पार्षद) शामिल हैं, क्योंकि सदन में कुल 4 निर्दलीय पार्षदों में से 2 पहले ही कांग्रेस के साथ हैं, जबकि बाकी 2 को भी स्थानीय समीकरणों के आधार पर जोड़ने की जिम्मेदारी वरिष्ठ नेताओं को दी गई है।
रिसॉर्ट में क्या चल रहा है? ‘एकजुटता और गुप्त मतदान की रिहर्सल’
विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, बाड़ेबंदी स्थल पर कांग्रेस पार्षदों को केवल ठहराया ही नहीं गया है, बल्कि उनके बीच मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की पूरी तैयारी चल रही है:
गोपनीयता और संचार नियंत्रण: पार्षदों के बाहरी संपर्कों को सीमित किया गया है ताकि भाजपा खेमे से कोई सीधा ‘ऑफर’ उन तक न पहुंच सके।
गुप्त मतदान का प्रशिक्षण: पार्षदों को यह समझाया जा रहा है कि नगर पालिका अधिनियम के तहत मेयर चुनाव में गुप्त मतदान होता है और इसमें किसी प्रकार का व्हिप लागू नहीं होता, जिससे क्रॉस वोटिंग करने वाले की पहचान उजागर नहीं हो सकती।
उत्साह का माहौल : पार्टी के अंदर यह माहौल बनाया जा चुका है कि खोने के लिए कांग्रेस के पास कुछ नहीं है, लेकिन अगर भाजपा के 15-16 पार्षदों ने क्रॉस वोटिंग कर दी, तो 21 सितंबर को नगर निगम में ऐतिहासिक बदलाव का सेहरा कांग्रेस के सिर बंधेगा।
उदयपुर का यह मुकाबला अब केवल दलगत निष्ठा का नहीं रहा। यह भाजपा के सांगठनिक अनुशासन बनाम फतेहसिंह राठौड़ की चुनावी घेराबंदी की सीधी जंग बन चुका है।
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