लोकतंत्र का चीरहरण : सत्ता की हनक, पुलिस की लाठी और बिकाऊ राजनीति का तांडव

भरतपुर से फतहनगर और सीकर तक—क्या अब राजस्थान में जनादेश को पुलिस के हुटर और बुलडोजर तय करेंगे?

उदयपुर/जयपुर। राजस्थान की पावन धरा पर इन दिनों निकाय चुनावों के नाम पर जो कुछ घटित हो रहा है, वह किसी भी संवेदनशील और राष्ट्रप्रेमी नागरिक के दिल को दहला देने वाला है। यदि इसे हम ‘लोकतंत्र’ का नाम दे रहे हैं, तो हमें मानना पड़ेगा कि हमने लोकतंत्र के पवित्र नैतिक मूल्यों की बलि दे दी है। नगर निगमों और पालिकाओं के अध्यक्षों और महापौरों का चयन अब जनता की निष्पक्ष राय से नहीं, बल्कि सत्ता की हनक, पुलिसिया दमन, आधी रात को दिए जाने वाले अवैध नोटिसों और बंद कमरों की बाड़ेबंदी से तय हो रहा है।

नामांकन वापसी की शुक्रवार को समय-सीमा समाप्त होने के बाद जो प्रशासनिक तमाशा सामने आया है, उसने स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता में बैठे लोगों के लिए जनता का फैसला कोई मायने नहीं रखता। जहाँ जनता ने सत्तारूढ़ दल को पूरी तरह नकार दिया, वहाँ ‘हाइब्रिड फॉर्मूले’ और पुलिस के दबाव के दम पर बोर्ड हथियाने का घिनौना खेल खेला गया।

फतहनगर की घटना : बगावत का जवाब ‘रात नौ बजे बुलडोजरी नोटिस’

उदयपुर की फतहनगर-सनवाड़ नगर पालिका की घटना सत्ता के इस दमनकारी रवैये का सबसे शर्मनाक उदाहरण है। 25 वार्डों वाली इस पालिका में जनता ने भाजपा को 13 और कांग्रेस को 12 सीटें दी थीं। लेकिन जब भाजपा के ही पूर्व चेयरमैन और वर्तमान पार्षद राजेश चपलोत ने अपनी पत्नी ममता चपलोत को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतार दिया, तो सत्ताधीशों का आचरण पूरी तरह से अलोकतांत्रिक हो गया।

बगावत को दबाने के लिए बीती रात 9 बजे उदयपुर विकास प्राधिकरण (UDA) का दस्ता नहीं, बल्कि सुखेर थाने की पुलिस की तीन गाड़ियां चपलोत के निवास पर पहुँचती हैं और ‘अवैध निर्माण’ का नोटिस थमा देती हैं। उससे एक दिन पूर्व ही उनकी होटल पर भी पालिका ने नोटिस चस्पां कर दिया था।

अचरज की बात यह है कि नोटिस पर तारीख 15 सितंबर की दर्ज है, उसे तामील 17 की रात को कराया जाता है, और वह भी उस व्यक्ति के नाम से जिसके नाम पर वह संपत्ति ही दर्ज नहीं है! यह कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से राजनीतिक प्रतिशोध है। संदेश सीधा है—या तो सत्ता के आगे घुटने टेको, या फिर प्रशासनिक उत्पीड़न के लिए तैयार रहो। अब वहाँ कांग्रेस प्रत्याशी के हटने के बाद मुकाबला भाजपा की सीमा और निर्दलीय ममता के बीच है।

भरतपुर व भीलवाड़ा: जनादेश की हत्या कर ‘निर्विरोध’ ताजपोशी

मुख्यमंत्री के गृह जिले भरतपुर का दृश्य तो और भी चिंताजनक है। 65 वार्डों वाले भरतपुर नगर निगम में जनता ने सत्तारूढ़ भाजपा को मात्र 20 सीटों पर समेट दिया था। जनभावनाओं और संख्याबल के हिसाब से कांग्रेस समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी विचित्रा सिंह का मेयर बनना लगभग तय था।

लेकिन जयपुर से मंत्रियों को भेजकर और प्रशासनिक मशीनरी का अनुचित दबाव बनाकर निर्दलीय प्रत्याशी का पर्चा वापस करवा दिया गया। इसके बाद भाजपा की अनुराधा सिंह ‘निर्विरोध’ मेयर घोषित कर दी गईं। यही कहानी भीलवाड़ा में दोहराई गई और धौलपुर में तो बिना पार्षद का चुनाव लड़े निर्दलीय व्यक्ति को कुर्सी सौंप दी गई। सवाल उठता है कि जब सब कुछ जयपुर के दफ्तरों से ही तय करना था, तो जनता को मतदान की कतारों में खड़ा करके लोकतंत्र का यह स्वांग क्यों रचा गया?

बाड़ेबंदी का अधर्म: कोई क्रिकेट खेल रहा है, कोई खून-खराबे की चेतावनी दे रहा है
प्रदेश की राजनीति आज एक हास्यास्पद और दुखद स्थिति में पहुँच गई है। सीकर में 38 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल करने के बावजूद कांग्रेस को अपने ही पार्षदों के बिकने या अगवा हो जाने का डर सता रहा है।

सीकर का बाड़ा: निर्वाचित पार्षदों के मोबाइल फोन जमा करा लिए गए हैं। वे रिसॉर्ट में कैद होकर क्रिकेट खेल रहे हैं और नाच रहे हैं—मानो वे जनता के प्रतिनिधि न होकर किसी डर से छुपाए गए बंदी हों।

डोटासरा का आक्रोश: कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने पुलिस प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए सीधा आरोप लगाया कि ‘पुलिस सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग कर पार्षदों को धमका रही है।’ उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस खींचतान में कोई अप्रिय घटना या खून-खराबा होता है, तो उसकी पूरी जवाबदेही राजस्थान सरकार और पुलिस प्रशासन की होगी।

जैसलमेर में पूर्व मंत्री डॉ. बी. डी. कल्ला ने आरोप लगाया कि सीआईडी के अधिकारियों को भेजकर उनके पार्षदों की जांच और उत्पीड़न कराया जा रहा है। खैरथल में तो एक पार्षद के लापता होने के बाद किडनैपिंग की प्राथमिक दर्ज करानी पड़ी है।

नैतिकता का पतन और लोकतांत्रिक भविष्य

जयपुर नगर निगम में भी 78 सीटें होने के बावजूद निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। कांग्रेस ने पुलिस कमिश्नर को ज्ञापन देकर कम अंतर से हारी सीटों पर पुलिसिया धांधली का आरोप लगाया है। वहीं अलवर में निर्दलीय प्रत्याशी रिंकल गर्ग का यह कहकर हटना कि “यहाँ खरीद-फरोख्त का बाजार लगा है और मैं पैसे देकर पद नहीं खरीदना चाहता”—हमारी पूरी राजनीतिक व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करता है।

21 सितंबर को जब मतदान होगा, तब औपचारिक रूप से विजेता घोषित कर दिए जाएंगे। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में भारत की महान लोकतांत्रिक परंपरा और जनता के विश्वास की पराजय हुई है। जब पुलिस की गाड़ियां डराने लगें, जब निर्वाचित प्रतिनिधियों को बाड़ों में कैद होना पड़े, और जब सत्ता पाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद का सहारा लिया जाए—तो समझना चाहिए कि हम एक जनप्रतिनिधिवादी लोकतंत्र से हटकर एक अनैतिक सत्तातंत्र की ओर बढ़ रहे हैं। समय आ गया है कि देश का जागरूक नागरिक इस गिरावट के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करे।

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