
फोटो जर्नलिस्ट : कमल कुमावत
उदयपुर। सियासत में धैर्य और निष्ठा की परीक्षा कितनी लंबी हो सकती है, इसका जीवंत उदाहरण आज झीलों की नगरी के नगर निगम गलियारों में देखने को मिला। जब उम्मीदें लगभग धुंधली होने लगी थीं और दिग्गजों की खींचतान में फैसले की घड़ी अंतिम पलों तक खिंच गई थी, तभी नियति ने वो पन्ना पलट दिया जिसका इंतजार पारस सिंघवी बरसों से दिल के किसी कोने में संजोए बैठे थे। पांचवीं बार पार्षद की दहलीज लांघने वाले सिंघवी के लिए यह सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि दशकों की जमीनी तपस्या, निष्ठा और उस बड़े सपने की मुकम्मल ताबीर है जो अब सच होने की दहलीज पर खड़ा है।
चौथी बार पार्षद बनने पर जब वे उप-महापौर (डिप्टी मेयर) की कुर्सी तक पहुंचे थे, तभी से शहर की प्रथम नागरिक की आसंदी पर बैठने की एक स्वाभाविक ख्वाहिश उनके मन में तैरती रही। इस बार जब वार्ड 24 से जनता ने उन्हें पांचवीं मर्तबा चुनकर भेजा, तो यह आस और गहरी हो गई थी। हालांकि, दिनेश भट्ट और प्रमोद सामर जैसे कद्दावर नेताओं के गुटों के बीच मचे सियासी घमासान में एक वक्त ऐसा लगा मानो यह सपना फिर फाइलों और समीकरणों में उलझ कर रह जाएगा।
नामांकन के अंतिम दो घंटों तक चली सांसें थाम देने वाली रस्साकशी के बीच जब संगठन के शीर्ष नेतृत्व ने सर्वसम्मति के लिए पारस सिंघवी के नाम पर अंतिम मुहर लगाई, तो सिंघवी खेमे में बरसों का इंतजार आंसुओं और मुस्कान के मिले-जुले अहसास में तब्दील हो गया। दो दिग्गजों के टकराव के बीच निगम की कार्यप्रणाली पर दशकों की पकड़ और कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव आखिरकार उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।
सुलह के केंद्र में उभरी निष्ठा : भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ और जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ वार्ड 51 से जीते प्रमोद सामर के पक्ष में थे, वहीं विधायक ताराचंद जैन व कटारिया खेमा वार्ड 45 से जीते पूर्व जिलाध्यक्ष दिनेश भट्ट के नाम पर अडिग था। इस तीखे गतिरोध के बीच संघ की मध्यस्थता ने पारस सिंघवी को उभारा जिस पर दोनों खेमों को झुकना पड़ा।
नामांकन, औपचारिकता बाकी : दोपहर 2:00 बजे जैसे ही पारस सिंघवी नामांकन दाखिल करने पहुंचे, कार्यकर्ताओं का उत्साह देखते ही बनता था। निगम में भाजपा के पास पहले से ही स्पष्ट संख्याबल मौजूद है, ऐसे में 21 सितंबर का मतदान केवल औपचारिकता रह गया है।
डिप्टी मेयर पर ब्राह्मण चेहरे की तलाश : मेयर पद तय होने के बाद पार्टी संतुलन साधने में जुट गई है। दिनेश भट्ट को उप-महापौर पद की पेशकश की गई है। यदि वे असहमत होते हैं, तो संगठन के पास अशोक नागदा और युवा पार्षद जतिन श्रीमाली के रूप में दो मजबूत ब्राह्मण विकल्प तैयार हैं।
उधर, कांग्रेस ने भी अपनी बिसात बिछाते हुए शहर जिलाध्यक्ष फतेहसिंह राठौड़ की पत्नी पूनम कुंवर को मैदान में उतारकर नामांकन करा दिया है। मगर आज की पूरी हलचल के केंद्र में सिर्फ एक ही भाव तैर रहा है—निगम की सीढ़ियों को पांच बार नापने वाले एक सिपाही की मुराद पूरी हो चुकी है और उदयपुर को अपना नया मुखिया मिलने जा रहा है।
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