आत्मसम्मान, उम्मीद और मानवीय संवेदनाओं को दर्शाता संस्थान का ‘लोगो’; 19-20 सितंबर को उदयपुर में 51 मंडपों में गूंजेंगे अटूट संकल्प के सात फेरे
उदयपुर। कभी किसी के लिए बिना सहारे दो कदम चलना एक असंभव सा सपना था, तो कभी किसी के लिए समाज की उपेक्षाओं के बीच अपना एक छोटा सा घर बसाना महज एक दूर की कौंध। किसी ने संस्थान के अस्पताल में अपनी दिव्यांगता का इलाज कराकर फिर से खड़ा होना सीखा, तो किसी ने हुनर सीखकर अपनी आजीविका की राह चुनी। संघर्ष, संताप और आत्मनिर्भरता की इसी कठिन राह से गुजरने के बाद अब 51 दिव्यांग एवं निर्धन जोड़े एक-दूसरे का हाथ थामकर विवाह मंडप तक पहुंचने जा रहे हैं।
उदयपुर स्थित नारायण सेवा संस्थान के ‘सेवा महातीर्थ’ बड़ी परिसर में 19 और 20 सितंबर को 47वां दिव्यांग एवं निर्धन सामूहिक विवाह समारोह का अत्यंत भव्य आयोजन होने जा रहा है। शुक्रवार को इस पुनीत और संवेदनात्मक आयोजन के आधिकारिक ‘लोगो’ (Logo) का विमोचन संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल, निदेशक पलक अग्रवाल, मीडिया प्रभारी विष्णु शर्मा हितैषी और जनसंपर्क प्रमुख भगवान प्रसाद गौड़ द्वारा विधिवत रूप से किया गया।
मार्मिकता और नए जीवन की किरण बिखेरता है यह ‘लोगो’
विमोचित किया गया यह ‘लोगो’ केवल एक कलात्मक प्रतीक चिन्ह मात्र नहीं है, बल्कि यह संघर्ष से उबरकर स्वाभिमान के साथ जीने की एक जीवंत और मार्मिक गाथा बयां करता है।
उम्मीद की नई रोशनी: यह ‘लोगो’ दिव्यांगता के अंधकार को चीरकर निकलने वाली आशा की उस किरण का प्रतीक है, जो एक टूटते हुए मन को फिर से जीने और जीवनसाथी संग सपनों का संसार बसाने का भरोसा देती है।
संवेदना और स्वाभिमान का मेल: इसमें दर्शाई गई आकृतियां यह संदेश देती हैं कि दिव्यांगता कोई अभिशाप या लाचारी नहीं, बल्कि जीवन का एक मोड़ मात्र है। यह ‘लोगो’ हर उस कदम की सराहना करता है जो इलाज और पुनर्वास के सहारे थमा था और अब मंडप की ओर बढ़कर एक नए अटूट रिश्ते में बंधने जा रहा है।
देश के विभिन्न राज्यों से जुटेंगे 102 युवक-युवतियां, शुरू होगा जीवन का नया अध्याय
इस दो दिवसीय महाआयोजन में देश के अलग-अलग राज्यों से चयनित 102 युवक-युवतियां (51 जोड़े) वैदिक मंत्रोच्चार और पावन परंपराओं के बीच सात फेरे लेकर अपने नए गृहस्थ जीवन में प्रवेश करेंगे।
इनमें से कोई हाथों की निशक्तता से जूझ रहा है तो कोई पैरों से लाचार है, कोई दृष्टिबाधित है तो कोई मुख-बधिर। लेकिन इन सभी नवदंपतियों की कहानी केवल दिव्यांगता के दर्द पर खत्म नहीं होती, बल्कि यह हौसले की नई इबारत लिखती है। इनमें से अधिकांश वर-वधू ऐसे हैं, जिनका नारायण सेवा संस्थान में निःशुल्क ऑपरेशन हुआ, कृत्रिम अंग या सहायक उपकरण लगाए गए और कौशल प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया गया। जिस संस्थान ने उन्हें चलना और सम्मान से जीना सिखाया, अब वही संस्थान उनके जीवन के सबसे सुंदर क्षण का साक्षी बनने जा रहा है।
इलाज और पुनर्वास से लेकर गृहस्थी बसाने तक का संबल
जब शारीरिक निशक्तता के साथ आर्थिक तंगी और सामाजिक पूर्वाग्रह जुड़ जाते हैं, तो दिव्यांगजनों के लिए विवाह की राह अत्यंत चुनौतीपूर्ण और पीड़ादायक हो जाती है। परिवारों पर आर्थिक बोझ, उपयुक्त जीवनसाथी की तलाश और शादी के बाद जीवन कैसे चलेगा—यह चिंता माता-पिता को जीवनभर अंदर ही अंदर सालती रहती है।
नारायण सेवा संस्थान ने सामूहिक विवाह को केवल एक औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे ‘पुनर्वास से परिवार निर्माण’ तक की एक अनूठी और संवेदनशील सामाजिक पहल के रूप में स्थापित किया है। संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने भावुक मन से बताया:
“पिछले 22 वर्षों में संस्थान द्वारा 2,582 दिव्यांग युवक-युवतियों का पूरे मान-सम्मान के साथ विवाह संपन्न कराया जा चुका है। हमारा मानना है कि दिव्यांगजन समाज में दया या सहानुभूति के पात्र नहीं हैं, बल्कि वे बराबर के अधिकार, सम्मान और अवसरों के हकदार हैं। यह आयोजन और इसका विमोचित ‘लोगो’ इसी मानवीय दृष्टिकोण और आत्मीयता की मिसाल है।”
सात फेरों के साथ मिलेगी पूर्ण गृहस्थी सामग्री
विवाह के बंधन में बंधने वाले इन नवदंपतियों को शुरुआती दिनों में किसी भी तरह की आर्थिक तंगी या असहायता का सामना न करना पड़े, इसके लिए संस्थान की ओर से नई गृहस्थी शुरू करने के लिए संपूर्ण आवश्यक सामग्री उपहारस्वरूप प्रदान की जाएगी।
गृहस्थी उपहार: डबल बेड पलंग, गद्दे, तकिए, कंबल, चादरें, अलमारी, गैस चूल्हा व सिलेंडर, पूर्ण किचन सेट, प्रेशर कुकर, तवा-कढ़ाई, पंखा, सिलाई मशीन, ट्रॉली बैग और दैनिक उपयोग का अन्य सभी सामान।
सहायक उपकरण: नवदंपतियों की शारीरिक आवश्यकता के अनुसार उन्हें व्हीलचेयर, ट्राइसाइकिल या अन्य सहायक साधन भी उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि वे आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन आगे बढ़ा सकें।
19 को हल्दी-मेहंदी की रंगत, 20 को गूंजेंगे वैदिक मंत्र
दो दिवसीय यह विवाह महोत्सव पूर्ण रूप से वैदिक संस्कृति, मंगल भजनों और रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से सराबोर रहेगा।
19 सितंबर: 51 जोड़ों की पारंपरिक हल्दी और मेहंदी की रस्में निभाई जाएंगी, जहाँ खुशियों के रंग बिखरेंगे और आंसुओं की जगह मुस्कान लेगी।
20 सितंबर: मुख्य विवाह मंडप में मंत्रोच्चार के बीच 51 जोड़ों का पाणिग्रहण संस्कार और कन्यादान संपन्न होगा।
इस अवसर पर देश-विदेश से अनेक संत-महात्मा, समाजसेवी, जनप्रतिनिधि और दानदाता उदयपुर पहुंचकर नवदंपतियों को आशीर्वाद देंगे तथा कई अतिथि स्वयं कन्यादान की रस्म में सहभागी बनेंगे।
नारायण सेवा संस्थान का यह प्रयास और यह नव-अनावृत ‘लोगो’ समाज की उस संकीर्ण सोच को सीधी चुनौती देता है, जो दिव्यांगता को किसी की क्षमता से बड़ा मान लेती है। यह आयोजन यह संदेश देता है कि यदि इंसान को सही समय पर अवसर, प्यार और संबल मिले, तो इलाज से मिले कदम रोजगार तक, और रोजगार से मिले हौसले अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने तक का सफर सफलतापूर्वक तय कर सकते हैं।
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