परदे के पीछे: जब दो दिग्गजों के टकराव में नेपथ्य का कलाकार बाज़ी मार ले गया

    सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर सिनेमा के सुनहरे दौर में जब राज कपूर और

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर

सिनेमा के सुनहरे दौर में जब राज कपूर और दिलीप कुमार के बीच किसी भव्य भूमिका को लेकर द्वंद्व छिड़ता था, तो अक्सर बाज़ी वो तीसरा कलाकार मार ले जाता था जिसे पटकथा लेखक ने इंटरवल तक केवल पार्श्व में खड़े रहने के लिए गढ़ा था। राजनीति का रंगमंच भी उस पुरानी सेल्युलाइड रील से जुदा नहीं है। उदयपुर नगर निगम के सातवें बोर्ड के गठन की यह दास्तान किसी कसी हुई थ्रिलर फिल्म के क्लाइमैक्स जैसी है, जहां आखिरी रील में सारा ड्रामा अचानक पलट गया।

राजकपूर साहब अक्सर कहा करते थे कि एक मँझे हुए अभिनेता की असली पहचान उसके संवादों में नहीं, बल्कि उसके सन्नाटे और सब्र में होती है। पारस सिंघवी के राजनीतिक सफर पर नज़र डालें, तो यह किरदार कभी किसी सीधी लकीर पर नहीं चला। पाँचवीं बार पार्षद बनकर सदन की देहरी लांघने वाले इस किरदार की फितरत में बेचैनी थी, एक बड़े मकाम पर अपना नाम देखने की बेताबी थी। जब-जब महत्वाकांक्षाओं के दरवाजे बंद मिले, तब-तब उनका आक्रोश संवाद बनकर फूटा; कभी अपनों से उलझे, कभी बड़े हुक्मरानों को खरी-खोटी सुनाकर नाराज़गियां मोल लीं। राजनीति के परदे पर कई बार उनका गुस्सा, कभी बहते आंसू और कभी अप्रत्याशित खामोशी देखी गई। पर वे जानते थे कि सियासत के कैमरे का एंगल कब और कैसे अपने चेहरे की तरफ मोड़ना है।

इधर मंच के केंद्र में दो कद्दावर चेहरे आमने-सामने तलवारें खींच चुके थे—एक तरफ सांगठनिक रसूख वाले प्रमोद सामर और दूसरी तरफ जनसरोकारों और जनाधार की दलील देते दिनेश भट्ट। दोनों के पीछे सूबे के दिग्गज और दिल्ली तक की लॉबिंग की भारी-भरकम रोशनी पड़ रही थी। संवाद तीखे थे, दांव पेंच कड़े थे और नामांकन की घड़ी रेत की तरह हाथ से फिसल रही थी। दोनों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं था।

और ठीक उसी मोड़ पर, जब दो भारी तोपों की जंग में समझौता असंभव दिखने लगा, नेपथ्य से एक नई पटकथा आकार ले रही थी। शहर जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ की खामोश शतरंज और संघ की परदे के पीछे की बिसात ने इस गतिरोध को भांप लिया। सामर और भट्ट के परस्पर विरोध ने वो खाली जगह बनाई, जिसमें पारस सिंघवी का पुराना धैर्य और रणनीतिक तालमेल अचानक सबसे मुफीद फिट बैठ गया।

इसे भाग्य की लॉटरी कहिए या सियासत की मजबूरी, आखिरी दो घंटों के भीतर वह किरदार जो सुबह तक रेस में बहुत पीछे गिना जा रहा था, एकाएक नायक की मुख्य पोशाक पहनकर कैमरे के सामने आ खड़ा हुआ।

बेशक, सिनेमा हॉल में जब ऐसी अनपेक्षित क्लाइमैक्स क्लिप चलती है, तो बालकनी में बैठे कई दर्शकों और यूनिट के पुराने साथियों को यह आसानी से हज़म नहीं होता। पार्टी के कई धड़ों के सीने में अब भी असंतोष की धुआंधार राख सुलग रही है। पर राजनीति की इस फीचर फिल्म का अंतिम सच यही है कि परदा गिरने से ठीक पहले ताली उसी के हिस्से आई, जिसने सही वक्त पर सही चौखट को साधे रखा। अब देखना यह है कि यह नया किरदार लेकसिटी की इस भव्य सत्ता-फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर कितना कामयाब बना पाता है।

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