
नारायण सेवा संस्थान में ‘अपनों से अपनी बात’ कथा का समापन; विश्वकर्मा जयंती पर कारीगरों के श्रम व हुनर को सम्मान देने का आह्वान
उदयपुर। उदयपुर स्थित नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में आयोजित की जा रही ‘अपनों से अपनी बात’ कथा का गुरुवार को विश्वकर्मा जयंती के पावन अवसर पर भावपूर्ण समापन हुआ। कथा के अंतिम दिन शिल्प, निष्काम कर्म, संयम, सेवा और जीवन में सकारात्मक शक्तियों के सदुपयोग से जुड़े आध्यात्मिक व जीवनोपयोगी प्रसंगों की संगीतमय व्याख्या की गई।
“कारीगरों के श्रम का सम्मान ही सच्ची विश्वकर्मा पूजा”
प्रशांत अग्रवाल ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि संसार में कोई भी वस्तु स्वतः निर्मित नहीं होती। प्रत्येक निर्माण के पीछे किसी न किसी शिल्पी या कारीगर का अथक श्रम, कौशल और समर्पण छिपा होता है। उन्होंने कहा कि समाज के निर्माता— बढ़ई, लोहार, राजमिस्त्री, दर्जी, कुम्हार और सुनार जैसे सभी हुनरमंदों के हाथों का सम्मान करना ही वास्तविक अर्थों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा है।
कथा के प्रमुख प्रसंग और जीवन संदेश : सूर्यदेव के तेज से दिव्य अस्त्रों का निर्माण: सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा द्वारा उनके तेज को सहन न कर पाने का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि विश्वकर्मा जी ने केवल सहन करने की सलाह नहीं दी, बल्कि समाधान निकाला। उन्होंने सूर्यदेव के तेज को संतुलित कर उससे सुदर्शन चक्र और त्रिशूल जैसे दिव्य अस्त्र बनाए। यह प्रसंग सिखाता है कि किसी प्रचंड शक्ति को नष्ट करने के बजाय यदि उसका सही दिशा में उपयोग किया जाए, तो वह लोककल्याणकारी बन सकती है।
स्वर्ण लंका और रावण का अहंकार: उन्होंने बताया कि भगवान शिव-पार्वती के लिए विश्वकर्मा जी ने स्वर्ण लंका बनाई थी, जिसे गृह प्रवेश कराने आए रावण ने दक्षिणा में मांग लिया। शिवजी ने उदारता से लंका दे दी, लेकिन आगे चलकर वही लंका रावण के लालच, अहंकार और विनाश का कारण बनी। उन्होंने संदेश दिया कि निर्माण श्रेष्ठ है, किंतु निर्मित वस्तु का मोह विनाश की ओर ले जाता है।
मयसभा का प्रसंग और संवेदनशीलता: महाभारत की मयसभा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दुर्योधन के जल में गिरने पर पांडवों की हंसी ने ईर्ष्या और बड़े युद्ध का बीजारोपण किया। किसी के गिरने पर हंसने के बजाय मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए, क्योंकि वाणी की छोटी-सी कटुता बड़े विवादों का कारण बनती है।
दिव्यांग सेवा ही मानव जीवन को संवारना है : प्रशांत अग्रवाल ने नारायण सेवा संस्थान के सेवा कार्यों से जोड़ते हुए कहा कि औजारों की पूजा के साथ-साथ दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण देकर आत्मनिर्भर बनाना भी उनके जीवन को पुनः संवारने का निर्माण कार्य है। दिव्यांगता से उबारकर किसी को अपने पैरों पर खड़ा करना ही भगवान विश्वकर्मा के पूजन-भाव को सही मायने में चरितार्थ करता है।
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