उदयपुर में भाजपा का आत्मघात या चमत्कार?

उदयपुर। उदयपुर नगर निगम के महापौर पद का चुनाव महज़ एक स्थानीय निकाय की रस्म नहीं रह गया है; यह इस बात की कठोर परीक्षा बन गया है कि क्या अनुशासन का दम भरने वाली भारतीय जनता पार्टी अपने ही घर के अंतर्कलह को साध पाएगी या फिर अपनी ही हठधर्मिता के हाथों मात खा जाएगी। सोमवार को होने वाले मतदान से ठीक पहले की जो बिसात बिछी है, वह साफ़ इशारा कर रही है कि भाजपा के इतिहास में वह सब कुछ घट सकता है, जो अब तक अकल्पनीय माना जाता रहा है।

अंकगणित की दृष्टि से देखें तो मामला बिल्कुल सीधा और एकतरफ़ा होना चाहिए था। 53 पार्षदों के प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा की राह में कोई रोड़ा नहीं दिखना चाहिए था, जबकि कांग्रेस के खाते में महज़ 23 पार्षद हैं। चार अन्य में से एक निर्दलीय और एक माकपा पार्षद का समर्थन कांग्रेस को मिलने के बाद भी विपक्ष 27 से आगे नहीं बढ़ता। लेकिन राजनीति केवल संख्याबल का खेल नहीं होती; यह असंतोष, आत्मसम्मान और भीतर सुलगती महत्वाकांक्षाओं का अखाड़ा भी होती है।

इस चुनाव का असली द्वंद्व भाजपा बनाम कांग्रेस का है ही नहीं; यह भाजपा का अपनी ही महत्वाकांक्षाओं और गुटबाज़ी के ख़िलाफ़ छिड़ा गृहयुद्ध है। पार्टी ने पांचवीं बार के पार्षद पारस सिंघवी पर दांव लगाया है, जबकि दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से जिलाध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ की पत्नी पूनम कुंवर मैदान में हैं।

पेंच यह है कि भाजपा के भीतर प्रमोद सामर और दिनेश भट्ट जैसे कद्दावर चेहरे पूरी ताक़त से दावेदारी में थे। दिनेश भट्ट को महापौर की कुर्सी तक पहुंचाने के लिए भाजपा की वरिष्ठ नेत्री अलका मूंदड़ा ने अपनी पूरी राजनीतिक ताकत झोंक रखी थी। यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि अलका मूंदड़ा और दिनेश भट्ट दोनों ही राज्यसभा सांसद सतीश पूनिया के अत्यंत निकटवर्ती माने जाते हैं और इस खेमे को पर्दे के पीछे से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का भी वरदहस्त व सशक्त समर्थन हासिल रहा है।

इतना ही नहीं, पूर्व उपमहापौर महेंद्र सिंह शेखावत, अतुल चंडालिया और आकाश वागरेचा जैसे प्रभावी पार्षदों की आकांक्षाओं को भी दरकिनार किया गया। इन सब को ‘बाड़ेबंदी’ में तो क़ैद कर लिया गया है, लेकिन जब दिल्ली और जयपुर के बड़े समीकरण स्थानीय ज़मीन पर टकराते हैं, तो असंतोष को किसी चारदीवारी में बांधना आसान नहीं होता।

हैरानी इस बात की है कि जिस भाजपा में हाईकमान या शीर्ष नेतृत्व के फ़रमान के आगे सिर झुकाने की परंपरा रही है, वहाँ अब खुली बगावत के सुर सुनाई दे रहे हैं। पूर्व पार्षद प्रेमसिंह शक्तावत का पार्टी छोड़ना केवल एक व्यक्ति का इस्तीफ़ा नहीं है, बल्कि उस गहरे असंतोष का सार्वजनिक विस्फोट है जो इस समय पार्टी की रगों में खदबदा रहा है।

और सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न तो पंजाब के राज्यपाल और मेवाड़ की राजनीति के भीष्म पितामह गुलाबचंद कटारिया की रहस्यमयी चुप्पी है। कटारिया जी ने औपचारिक तौर पर कोई संकेत नहीं दिया है, मगर राजनीति में शब्दों से ज़्यादा मौन बोलता है। उनके निष्ठावान समर्थकों के हाव-भाव और भीतरखाने चल रही सुगबुगाहट यह बता रही है कि इस बार ‘ऊपर से थोपे गए’ निर्णय को पचा पाना स्थानीय कैडर के लिए आसान नहीं हो रहा।

अब कल मतदान होना है। क्या भाजपा के असंतुष्ट पार्षद भीतरघात का ऐसा रास्ता चुनेंगे जो पार्टी के 53 के आंकड़े को बिखेरकर कांग्रेस की झोली में अप्रत्याशित जीत डाल दे? या फिर ऐन वक्त पर पार्टी व्हिप और संगठन का भय काम कर जाएगा और सब कुछ चुपचाप मान लिया जाएगा? उदयपुर का यह चुनाव सिर्फ़ एक नया महापौर नहीं चुनेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि सत्ता के दंभ और खेमेबाज़ी में उलझे नेता अपने कार्यकर्ताओं की नाराज़गी को कितना संभाल पाते हैं।

 

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