
सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर।
ज़िन्दगी की पटकथा भी कितनी अजीब होती है। कभी-कभी विधाता जिसे सबसे अधूरा और बिखरा हुआ सीन सौंपता है, वही किरदार आगे चलकर सबसे मुकम्मल दास्तान लिख देता है। चार्ली चैपलिन ने कभी कहा था कि दुनिया को क्लोज़-अप में देखो तो वह त्रासदी नज़र आती है, लेकिन अगर ज़रा दूर हटकर ‘लॉन्ग-शॉट’ में देखा जाए तो वही ज़िंदगी एक खूबसूरत नज़्म बन जाती है। उदयपुर की झील-किनारे, बड़ी के सेवा महातीर्थ में जो दृश्य रविवार को घटा, वह किसी महान क्लासिक फ़िल्म के उस क्लाइमेक्स जैसा था, जहां हॉल में बैठा हर दर्शक अंधेरे में चुपचाप अपने आंसू पोंछ रहा होता है।
राज कपूर साहब अगर आज होते, तो शायद कहते कि ‘जीना इसी का नाम है’। उस मंडप में 50 दूल्हे और 50 दुल्हनें थीं। सौ ज़िंदगियां, सौ मुकद्दर और न जाने कितने बरसों का संचित सन्नाटा। कोई बैसाखी के सहारे चल रहा था, किसी के पांव की जगह जयपुर-फुट था, तो किसी का एक हाथ किसी भयानक सड़क हादसे की बलि चढ़ चुका था। दुनिया जिसे ‘दिव्यांगता’ का क्रूर तमगा देकर हाशिए पर धकेल देती है, वे सब उस रोज़ तमाम सामाजिक पूर्वाग्रहों के पर्दे को चीरकर नायक और नायिका बनकर खड़े थे।

नारायण सेवा संस्थान का यह 47वां सामूहिक विवाह केवल वैदिक मंत्रोच्चार और सात फेरों की रस्म अदायगी नहीं था, यह दरअसल मनुष्यता के पुनर्जन्म का घोषणापत्र था। सोचिए ज़रा, यह वही परिसर था जहाँ इनमें से कई नौजवान कभी स्ट्रेचर पर, लाचारी से भीगी आंखों और टूटे हुए वजूद के साथ आए थे। यहीं डॉक्टरों ने उनके घावों पर मरहम रखा, यहीं उन्हें कृत्रिम अंग मिले, यहीं उन्होंने दोबारा चलना और आत्मसम्मान से कमाना सीखा। और नियति का कमाल देखिए—जिस चौखट पर वे कभी बैसाखियों के सहारे दर्द का इलाज कराने आए थे, उसी चौखट से वे जीवनसाथी का हाथ थामकर अपने नए आशियाने की ओर विदा हो रहे थे। इससे बेहतर ‘सर्कल ऑफ लाइफ’ का दृश्य कोई निर्देशक अपनी रील पर क्या उतारेगा?
संस्थान के प्रशांत अग्रवाल जब बात कर रहे थे, तो उनकी आवाज़ में आंकड़ों से ज़्यादा इंसानी दर्द की गूंज थी। देश के 2.61 करोड़ दिव्यांगजनों की उस मूक पीड़ा का ज़िक्र, जिसे हमारी संवेदनहीन व्यवस्था अक्सर नज़रअंदाज़ कर देती है। लेकिन इस मंडप की सबसे खूबसूरत बात यह थी कि यहां कुछ जोड़े ऐसे भी थे, जहां एक साथी सक्षम था और दूसरा दिव्यांग। उस सक्षम साथी ने समाज के बने-बनाए खोखले पैमानों को ठेंगा दिखाते हुए जिस्म की खामी के पार रूह की खूबसूरती को चुना। पिछले 22 वर्षों में 2,582 जोड़ों को गृहस्थी का मान दिलाना कोई मामूली रिकॉर्ड नहीं है; यह उस समाज के गाल पर तमाचा है जो आज भी दया और बराबरी के फ़र्क को नहीं समझता।

और विदाई का वह मंज़र! जब नवदंपतियों को पलंग, अलमारी, सिलाई मशीन, गैस चूल्हा और राशन से लेकर ज़रूरत के मुताबिक व्हीलचेयर सौंपी जा रही थी, तो किसी नववधू की आँखों में छलकते पानी का मोल दुनिया की कोई तिजोरी नहीं चुका सकती थी। वह महज़ सामान नहीं था; वह एक औरत का वह हक़ था जिसे यह समाज अक्सर लाचारी के नाम पर छीन लेता है।
कैलाश मानव, कमला देवी, वंदना अग्रवाल, यश मेहता और पलक अग्रवाल के आशीषों के बीच जब जोधपुर की स्वतंत्रता सेनानी परिवार की सुशीला परिहार ने उन बेटियों के सिर पर हाथ रखा, तो लगा मानो सदियों की थकान एक पल में मिट गई हो।

फ़िल्में ख़त्म हो जाती हैं, टाइटल्स स्क्रॉल होने लगते हैं और सिनेमाहॉल की बत्तियां जल जाती हैं। लेकिन उदयपुर के इस महातीर्थ में जो फ़िल्म शुरू हुई है, उसका कोई ‘द एंड’ नहीं है। यह 50 नए परिवारों का वह इंटरवल है, जहां से एक नई, स्वाभिमानी ज़िन्दगी का दूसरा हाफ़ शुरू होता है। शरीर की सीमाएं हो सकती हैं साहब, लेकिन जब इंसान की रूह उड़ान भरने की ज़िद ठान ले, तो मुकद्दर की कोई भी खरोंच सपनों की डोली का रास्ता नहीं रोक सकती।



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