उदयपुर में रामलीला की वापसी : जब डिजिटल दौर में मंच पर उतरते हैं मर्यादा पुरुषोत्तम

सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर

सिनेमा के जादूगर चार्ली चैपलिन ने कभी कहा था कि जिंदगी करीब से देखो तो एक ट्रेजेडी है और दूर से देखो तो कॉमेडी। मगर हमारे यहां, हिंदुस्तान की इस बहुरंगी माटी में, जिंदगी न ट्रेजेडी है न कॉमेडी; वह तो सीधे-सीधे ‘लीला’ है। एक ऐसा महानाट्य जहां हर इंसान अपना किरदार निभाकर नेपथ्य में लौट जाता है।

आज जब हाथ की मुट्ठी में सिमटे मोबाइल स्क्रीन पर रील, शॉर्ट्स और कृत्रिम बुद्धि (एआई) का शोर हमारे सुकून को लील रहा है, ठीक उसी दौर में झीलों के शहर उदयपुर से एक सुकूनभरी खबर आई है। सूरजपोल के बाहर स्थित निम्बार्क कॉलेज के मैदान में 9 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक दस दिवसीय भव्य रामलीला का मंचन होने जा रहा है। वृंदावन के पुष्टिमार्गीय संस्थान से आए 40 फनकार जब रंग-रोगन लगाकर, काठ के धनुष और जरी के मुकुट पहनकर मंच पर उतरेंगे, तो दरअसल वे केवल वाल्मीकि या तुलसी के पन्नों को नहीं दोहरा रहे होंगे; वे हमारे उस खोते जा रहे मानवीय वजूद को आवाज दे रहे होंगे, जो आज की अंधी भागदौड़ में कहीं गुम हो गया है।

सवाल उठना लाजिमी है कि ओटीटी, सिनेमाघरों और 4K स्क्रीन के इस चकाचौंध भरे जमाने में लकड़ी के तख्तों पर होने वाली इस पुरानी रामलीला की भला क्या प्रासंगिकता रह गई है?

प्रासंगिकता यह है कि तकनीक आपको विजुअल इफेक्ट्स (वीएफएक्स) दे सकती है, लेकिन ‘मर्यादा’ का अहसास नहीं दे सकती। राजकपूर साहब अक्सर कहा करते थे कि हिंदुस्तान का दिल किसी भव्य स्टूडियो के सेट पर नहीं, बल्कि लोकनाट्य की धूल भरी जाजम पर धड़कता है। जब मंच पर दशरथ अपने दिए वचन के लिए तड़पते हैं, जब भरत अपने बड़े भाई की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राजधर्म निभाते हैं, जब केवट अपने प्रभु के चरण पखारने की निश्छल जिद ठानता है—तो वह कोई साधारण नाटक नहीं होता। वह उस समाज को आईना दिखाना होता है जहां आज सगे भाई चंद गज जमीन के टुकड़े के लिए अदालत और थानों के चक्कर काटते हैं।

रामलीला हमें याद दिलाती है कि रिश्ते अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) से नहीं, त्याग और समर्पण से चलते हैं।

पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी और उनकी रामलीला समिति की यह पहल इसलिए भी काबिले-तारीफ है कि लंबे अंतराल के बाद मेवाड़ की इस ऐतिहासिक धरा पर नवरात्र के पावन दिनों में लोक-संस्कृति की यह सरिता बहेगी। 9 अक्टूबर को नारद मोह और पृथ्वी पुकार से शुरू होकर यह सफर 18 अक्टूबर को राज्याभिषेक तक पहुंचेगा, और फिर 20 अक्टूबर को सेक्टर-14 के कल्लाजी बावजी चौराहे पर रावण दहन के साथ अहंकार के भस्म होने का गवाह बनेगा।

दशहरे पर रावण का पुतला जलाना बहुत आसान रस्म है। सिनेमा के पर्दे पर भी हमने न जाने कितनी बार विलेन को मरते देखा है। लेकिन असली चुनौती तो उस रावण से लड़ने की है जो हमारे भीतर लालच, नफरत और असंवेदनशीलता के रूप में दस सिर उठाकर हर रोज अट्टहास करता है।

रामलीला मंच का वह कच्चा प्रकाश, वह पर्दा उठने की घंटी, और संवादों की वह सादगी हमें हमारे बचपन, हमारे साझा संस्कारों और उस लोक-स्मृति से जोड़ती है जिसे आधुनिकता ने लगभग बिसरा दिया है। यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारे समाज के मुरझाते जा रहे नैतिक रेशों में ताजी हवा फूंकने की एक शिद्दत भरी कोशिश है। जब तक समाज में स्वार्थ रहेगा, तब तक राम के त्याग और लक्ष्मण के भ्रातृत्व की यह लीला हर युग, हर शहर और हर पीढ़ी के लिए उतनी ही प्रासंगिक बनी रहेगी।

 

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