विधायक ताराचंद जैन की तत्परता से टला उदयपुर का जल संकट: 72 घंटे के तुगलकी फरमान पर रोक, 48 घंटे में ही होगी जलापूर्ति

सैयद हबीब, उदयपुर

यदि आपको व्यवस्था की लाचारी, अफ़सरशाही के आसान बहानों और सियासत की मजबूरी का एक साथ दीदार करना हो, तो उदयपुर में चल रहे पानी के तमाशे को देख लीजिए। जिस शहर को दुनिया ‘झीलों की नगरी’ कहकर पूजती है, वहाँ के हुक्मरान और जलदाय विभाग के आला अफ़सर आज शहरवासियों को हर तीसरे दिन (72 घंटे में) पानी पिलाने का सरकारी फरमान थमाने पर आमादा थे। गनीमत रही कि शहर विधायक ताराचंद जैन ने त्यौहारों की नब्ज और जनता के गुस्से की तपिश को भांपते हुए इस मामले में दखल दिया, जिसके बाद अफ़सर फिलहाल 48 घंटे में एक बार पानी देने पर राजी हुए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह समस्या का स्थाई समाधान है या सिर्फ त्यौहारों तक जनता के गुस्से को दबाए रखने की एक प्रशासनिक बाजीगरी?

अधीक्षण अभियंता रवींद्र कुमार चौधरी और उनके महकमे के पास हर बार की तरह वही घिसा-पिटा तर्क मौजूद था—”इस बार बारिश कम हुई है, इसलिए जल उत्पादन में कटौती जरूरी है।”

हुक्मरानों को शायद अपना ही इतिहास याद नहीं रहता। इन अफ़सरों को आईना दिखाना जरूरी है कि 1995 से लेकर 2005 के उस खौफनाक दौर को याद करें, जब पूरे एक दशक तक उदयपुर में बादलों ने मुँह मोड़ रखा था। फतहसागर और पिछोला के पेटे ऐसे सूख चुके थे कि नावें पानी में तैरने के बजाय सूखी रेत में धंसी और सड़ती नज़र आती थीं। तब तो शहर के पास न तो देवास-द्वितीय था और न ही मानसी-वाकल जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं। इसके बावजूद उस दौर के प्रशासनिक तंत्र और पूर्व सांसद डॉ. गिरिजा व्यास जैसे दूरदर्शी नेताओं ने अपनी इच्छाशक्ति से जयसमंद पाइपलाइन को खड़ा कर दिखाया था और उस भयंकर सूखे में भी शहर को 48 घंटे के अंतराल पर पानी पिलाकर व्यवस्था को जिंदा रखा था।

आज जब योजनाओं के अंबार हैं, बजट के बड़े-बड़े दावे हैं, तब अफ़सरशाही का पहला और सबसे आसान हथियार यही होता है कि सीधे जनता के हलक पर छुरी चला दो—48 घंटे से बढ़ाकर 72 घंटे का फरमान जारी कर दो।

विधायक ताराचंद जैन की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने जनता के इस दर्द को न केवल समझा, बल्कि नगर निगम के पार्षदों के साथ बैठक कर अफ़सरों की इस मनमानी पर फिलहाल ब्रेक लगाया। उन्होंने दो-टूक कहा कि आगामी त्यौहारों के सीजन में जनता को इस किल्लत के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता और 48 घंटे की सप्लाई को हर हाल में बरकरार रखा जाए। अफ़सरों ने भी झट से ‘तकनीकी टीम’ बनाने और ‘हरसंभव प्रयास’ करने का वही पुराना प्रशासनिक जुमला दोहरा दिया।

लेकिन असल बीमारी की जड़ कहीं और है। बैठक में बड़ी झील से पटेल सर्कल तक पानी लाने, जयसमंद की जर्जर पाइपलाइन को बदलने, कुएं-बावड़ियों को जिंदा करने और नए नलकूप खोदने की जो फाइलें जयपुर भेजने की बात कही गई है—वे फाइलें अब तक सचिवालय की धूल क्यों फांक रही थीं? क्या अफ़सरों को संकट के दरवाजे पर दस्तक देने का इंतजार था? शहर में हजारों गैलन पानी लीकेज की भेंट चढ़ जाता है, अवैध कनेक्शनों की भरमार है, उस पर निगरानी का पहरा लगाने में किसका हाथ कांपता है?

विधायक ने भरोसा दिलाया है कि वे जयपुर से इन प्रस्तावों को जल्द स्वीकृत कराएंगे और पुराने पनघटों, हैंडपंपों व बावड़ियों को जिंदा किया जाएगा। यह आश्वासन सुनने में भला लगता है। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि जब तक हमारी नौकरशाही फाइलों से निकलकर ज़मीन पर जल-प्रबंधन का स्थाई ढांचा तैयार नहीं करेगी, तब तक उदयपुर जैसे खूबसूरत शहर की प्यास सिर्फ मौसम के मिजाज और अफ़सरों की मेहरबानी पर ही लटकी रहेगी। देखना यह है कि 48 घंटे की यह राहत त्यौहारों के बाद भी कायम रहती है, या फिर अफ़सरशाही अपने 72 घंटे वाले उसी क्रूर फॉर्मूले को दोबारा जनता पर थोप देगी।

 

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