फोटो एंड वीडियो : कमल कुमावत
उदयपुर। जिस शहर को दुनिया पर्यटन की राजधानी और तहजीब का गहवारा कहकर सराहती है, उसी उदयपुर की ऐतिहासिक गलियों में आज गुंडई और समानांतर सत्ता का खौफनाक चेहरा बेपरदा हुआ है। उदयपुर के लालघाट और नावघाट की सार्वजनिक सड़कों पर खड़े होकर अगर कोई फोटोग्राफर कैमरा थाम ले, तो स्थानीय रसूखदार न सिर्फ कैमरे तोड़ देते हैं, बल्कि बीच सड़क गिरेबान पकड़कर कानून की धज्जियां उड़ाने में भी खौफ महसूस नहीं करते। राजस्थान पत्रिका के वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट प्रमोद सोनी और उनके बेटे दीपक सोनी के साथ लालघाट रोड पर हुई बर्बर हाथापाई और जानलेवा हमले की यह वारदात सिर्फ एक मारपीट की घटना नहीं है, यह इस बात का नग्न प्रमाण है कि पर्यटन नगरी की सार्वजनिक सड़कों पर नगर निगम और पुलिस का नहीं, बल्कि मनबढ़ दुकानदारों की निजी मिल्कियत का कानून चलने लगा है।
कैमरा तोड़ा, बाल पकड़कर घसीटा :
घंटाघर थाने में दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) के तथ्य इस प्रकार हैं। 28 अक्टूबर की सुबह करीब 10 बजे दीपक सोनी अपने साथियों के साथ लालघाट रोड पर एक प्री-वेडिंग शूट कर रहे थे। इसी दौरान ‘शाह हैंडीक्राफ्ट’ के सिद्दीक और उसके साथियों ने न केवल अभद्रता की, बल्कि दीपक का कीमती कैमरा क्षतिग्रस्त कर मारपीट शुरू कर दी।
बात यहीं खत्म नहीं हुई। जब जानकारी पाकर वरिष्ठ फोटो पत्रकार प्रमोद सोनी अपने बेटे को बचाने मौके पर पहुंचे, तो कानून के खौफ से बेपरवाह इन आरोपियों ने एक वरिष्ठ पत्रकार पर भी हाथ उठा दिया, उनका गिरेबान पकड़ा, दुकान के भीतर बाल खींचकर घसीटा और शटर गिराकर दोनों को जान से मारने की धमकियां दीं। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 115(2), 126(2), 324(4) और 3(5) के तहत मुकदमा दर्ज कर अपनी औपचारिकता पूरी कर ली है, लेकिन यह सवाल जस का तस खड़ा है कि दिनदहाड़े भरे बाजार में एक सम्मानित पत्रकार के परिवार को बंधक बनाने की हिम्मत इन गुंडों में आई कहां से?
सड़कों पर उतरा मीडिया जगत : महापौर, पार्षद और पत्रकारों ने घेरा
घटना की खबर फैलते ही शहर के समूचे पत्रकार जगत, जनप्रतिनिधियों और फोटोग्राफरों में तीखा आक्रोश फैल गया। लेकसिटी प्रेस क्लब के अध्यक्ष कुलदीप सिंह, पूर्व अध्यक्ष मनु राव, राजस्थान पत्रिका के वरिष्ठ रिपोर्टर मोहम्म्द इलियास, धीरेंद्र जोशी, वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट कैलाश टांक, राजेंद्र हिलोरिया, कमल कुमावत, ऋषभ जैन तथा एडवोकेट अशोक सिंघवी समेत बड़ी संख्या में पत्रकार, अधिवक्ता और गणमान्य नागरिक तत्काल मौके पर पहुंचे और पुलिस-प्रशासन को आड़े हाथों लिया।
पत्रकारों के इस स्वतःस्फूर्त आक्रोश के साथ नगर निगम के महापौर पारस सिंघवी, स्थानीय पार्षद विजय आहुजा तथा फोटोग्राफर एसोसिएशन के प्रमुख पदाधिकारी भी मौके पर पहुंचे। महापौर ने आरोपियों निर्माणाधीन मकान दुकान की जांच कर नोटिस जारी करने के निर्देश दिए। आला पुलिस अधिकारियों की टीम भी मौके पर पहुंची, जहां पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों ने एक स्वर में दो टूक चेतावनी दी कि सार्वजनिक रास्तों पर गुंडागर्दी और मीडियाकर्मियों पर जानलेवा हमले करने वाले इन असामाजिक तत्वों की तत्काल गिरफ्तारी और सख्त कानूनी कार्रवाई से कम कुछ भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रोफेशनल फोटोग्राफर एसोसिएशन उदयपुर के संस्थापक एसपी चौहान, अध्यक्ष बजरंग सिंह चौहान, सलाहकार कमल कुमावत, उपाध्यक्ष गणपत सालवी, सचिव मुकुल कुमावत, सह सचिव राकेश पूर्बिया, प्रवक्ता घनश्याम प्रजापत, खेल मंत्री अनिल जायसवाल, संगठन मंत्री जितेंद्र कुमावत एवं संगठन के तमाम सदस्यगण ने विरोध प्रदर्शन कर न्याय की मांग की।
सार्वजनिक सड़कों पर तुगलकी फरमान : निगम का इक़बाल कहां दफन है?
सवाल सीधा और चुभता हुआ है—उदयपुर की आम सड़कों, घाटों और गलियों का मालिक कौन है? क्या यह शहर नगर निगम और चुने हुए जनप्रतिनिधियों से संचालित होता है, या फिर लालघाट-नावघाट के दुकानदारों ने यहां अपनी अलग रियासत कायम कर ली है?
नावघाट और लालघाट जैसे सार्वजनिक इलाकों में दुकानदारों ने सरेआम पोस्टर चस्पा कर रखे हैं कि यहां ‘प्री-वेडिंग शूट वर्जित है’। किसी भी सभ्य समाज में यह अधिकार केवल स्थानीय स्वायत्त शासन, प्रशासन या नगर निगम के पास हो सकता है कि वह सार्वजनिक संपत्तियों के व्यावसायिक उपयोग की नियमावली तय करे। लेकिन यहां तो चौराहों पर बैठे दुकानदारों ने खुद को कानून का रखवाला घोषित कर दिया है। नगर निगम की चुप्पी और बेबसी इतनी शर्मनाक है कि कोई भी एरा-गैरा सार्वजनिक रास्तों पर पोस्टर टांगकर राहगीरों और फोटोग्राफरों को धमकाने लगता है। अगर प्रशासन ने इन अवैध पोस्टरों और मनमाने प्रतिबंधों के खिलाफ बुलडोजर नहीं चलाया, तो कल को शहर की हर सड़क पर हर कोई अपनी जागीर का बोर्ड टांगकर खड़ा हो जाएगा।
प्री-वेडिंग की स्पष्ट नीति और ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ की अनिवार्य दरकार
यह विवाद किसी एक दिन की तकरार का नतीजा नहीं है। यह नगर निगम और पर्यटन महकमे की उस नीतिगत नपुंसकता की उपज है, जिसने प्री-वेडिंग और कमर्शियल शूटिंग के लिए कोई वैध, पारदर्शी और स्पष्ट गाइडलाइन तय नहीं की। अगर निगम चाहता, तो समय रहते नियम बनाता, वैध परमिट और शुल्क की व्यवस्था लागू करता, जिससे न पर्यटकों को असुविधा होती और न ही किसी स्थानीय मनबढ़ को कानून हाथ में लेने का बहाना मिलता।
दूसरा और सबसे अहम पहलू है पत्रकारों की सुरक्षा का। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का सिपाही अगर अपने शहर की सड़कों पर कैमरे के साथ सुरक्षित नहीं है, अगर उसकी और उसके परिवार की जान पर हर चौराहे पर खतरा मंडरा रहा है, तो फिर सरकार के ‘सुशासन’ के दावों की कलई खुल जाती है। यह घटना चीख-चीखकर याद दिला रही है कि राजस्थान में ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ (Journalist Protection Act) अब कोई मांग नहीं, बल्कि वक्त की सबसे अनिवार्य जरूरत बन चुका है।
अगर इस मामले में घंटाघर पुलिस ने किसी भी रसूख के दबाव में आए बिना आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती और कठोरतम कानूनी नजीर पेश नहीं की, तो यह मान लिया जाएगा कि उदयपुर में कानून-व्यवस्था की डोर प्रशासन के हाथ से फिसलकर गुंडों की जेब में जा चुकी है।
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