पुस्तक विमर्श व समीक्षा: जब भूगोलवेत्ता की दृष्टि ने रचा काव्य का आईना—’प्रकृति के प्रतिबिंब’

उदयपुर। साहित्य जब केवल कल्पना की उड़ान न रहकर वैज्ञानिक यथार्थ, पर्यावरण की चिंता और भीतरी मानवीय संवेदनाओं का संगम बन जाए, तो वह कालजयी दस्तावेज का रूप ले लेता है। रविवार को लेकसिटी के साहित्यिक पटल पर एक ऐसा ही विरल क्षण साकार हुआ, जब प्रख्यात भूगोलवेत्ता, शिक्षाविद् एवं ‘प्रकृति रिसर्च सोसाइटी’ के संस्थापक अध्यक्ष प्रो. पी. आर. व्यास द्वारा रचित नवीन काव्य-संग्रह ‘प्रकृति के प्रतिबिंब’ का लोकार्पण एक भव्य साहित्यिक उत्सव के रूप में संपन्न हुआ।

एमएलएसयू और जीजीटीयू के पूर्व कुलपति प्रो. आई. वी. त्रिवेदी की अध्यक्षता तथा पूर्व राज्य मंत्री जगदीश श्रीमाली के मुख्य आतिथ्य में आयोजित यह समारोह महज़ एक पुस्तक विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रकृति, साहित्य और मानव चेतना के त्रिकोणीय अंतर्संबंधों पर एक गंभीर समीक्षात्मक संगोष्ठी में तब्दील हो गया।

पुस्तक समीक्षा: भूगोल की तथ्यात्मकता और काव्य की तरलता का अद्भुत संगम

साहित्यिक समालोचना के सत्र में वरिष्ठ समीक्षक प्रो. मलय पानेरी एवं श्रीमती मंजू चतुर्वेदी ने ‘प्रकृति के प्रतिबिंब’ के आंतरिक शिल्प और कथ्य की परतें खोलीं:

  • भूगोल से कविता तक का सेतु: वक्ताओं ने रेखांकित किया कि प्रो. व्यास मूलतः भूगोलवेत्ता हैं, इसलिए उनकी कविताओं में प्रकृति केवल उपमा या अलंकार बनकर नहीं आती; वह पहाड़ों, नदियों, घाटियों और बदलते मौसमों के सजीव यथार्थ के साथ सांस लेती है।

  • काव्य में पर्यावरणीय संकट की गूंज: समीक्षा के दौरान आलोचकों ने माना कि यह संग्रह प्रकृति के केवल सौंदर्य का गान नहीं है, बल्कि यह सूखते जलस्रोतों और उजड़ते वनों के प्रति एक बौद्धिक चेतावनी भी है।

स्वयं रचनाकार प्रो. पी. आर. व्यास ने अपनी सृजन-यात्रा और प्रेरणा को साझा करते हुए जब अपनी कविता की पंक्तियां लयबद्ध रूप से प्रस्तुत कीं—

“शैल शिखर सब सूख रहे हैं अब मनुआ क्यों पछताय रे,

नदियां सूखीं झरने सूख गए, सूख गई वनराय रे…”

तो सभागार में मौजूद साहित्यप्रेमी प्रकृति के इस मार्मिक विलाप और आत्ममंथन से गहरे जुड़ गए।

समीक्षकों व विद्वानों की दृष्टि में कृति का मूल्यांकन

  • साहित्य और विज्ञान का समन्वय (राधेश्याम मेवाड़ी): विशिष्ट अतिथि व कवि राधेश्याम मेवाड़ी ने कहा कि प्रो. व्यास ने अपने भौगोलिक ज्ञान और साहित्यिक संवेदनाओं का इतना प्रभावी समन्वय किया है कि कविताएं पर्यावरण की प्रामाणिक आवाज़ बन गई हैं।

  • पर्यावरण संरक्षण की पुकार (किशन दाधीच): वरिष्ठ साहित्यकार किशन दाधीच ने पुस्तक को चेतना जगाने वाला साहित्य बताते हुए कहा कि यह संग्रह समाज में प्रकृति संरक्षण के प्रति गहरी जवाबदेही का भाव पैदा करता है।

  • चेतना का वाहक (बसंत सोलंकी): राजस्थान साहित्य अकादमी के सचिव बसंत सोलंकी ने समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘प्रकृति के प्रतिबिंब’ जैसी कृतियां आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत हैं, जो आधुनिक समाज को उसकी जड़ों और पर्यावरण से दोबारा जोड़ने का माध्यम बनती हैं।

पूर्व नगर नियोजक सतीश श्रीमाली ने शहरीकरण और प्राकृतिक ताने-बाने पर, मुख्य अतिथि जगदीश श्रीमाली ने सामाजिक सरोकारों पर और अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आई. वी. त्रिवेदी ने शिक्षा, ज्ञान और कविता के सामूहिक दायित्व पर अपने विचार रखे।

सांस्कृतिक गरिमा और उत्सव का समापन

समारोह का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना और प्रकृति शोध संस्थान के कुलगीत के साथ हुआ, जिसे प्रो. व्यास ने लिखा, प्रो. प्रेम भंडारी ने संगीतबद्ध किया और एमएलएसयू संगीत विभाग की पामिल भंडारी ने स्वर दिया था।

आरंभ में प्रो. पलक भारद्वाज ने स्वागत भाषण दिया, कार्यक्रम का सुगम व सारगर्भित संचालन डॉ. सरिता जैन ने किया और अंत में डॉ. देवेंद्र सिंह चौहान ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम संयोजक डॉ. विष्णु शंकर पालीवाल के अनुसार, ‘प्रकृति के प्रतिबिंब’ का यह लोकार्पण समकालीन हिंदी साहित्य में पर्यावरण-केंद्रित लेखन को एक नया विमर्श और दिशा प्रदान करेगा।

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