
उदयपुर। राजस्थान के उदयपुर स्थित संभाग के सबसे बड़े सरकारी मीरा गर्ल्स कॉलेज से आई खबरें न केवल विचलित करने वाली हैं, बल्कि यह हमारे प्रशासनिक तंत्र की सड़ चुकी मानसिकता का प्रमाण भी हैं। यहाँ एक तरफ तो मेधावी छात्राओं को मिलने वाली 112 स्कूटियां पिछले तीन सालों से खुले आसमान के नीचे कबाड़ में तब्दील हो रही हैं, और दूसरी तरफ जब छात्राएं अपना हक मांगने पहुँचती हैं, तो उन्हें ‘बीमारी’ और ‘कठपुतली’ जैसे अपमानजनक शब्दों से नवाजा जाता है। यह पूरा प्रकरण सरकारी संपत्ति की बर्बादी और पद के अहंकार की एक घिनौनी दास्तान है।
कुत्तों के भरोसे करोड़ों की संपत्ति और हास्यास्पद बहानेबाजी
कॉलेज परिसर में खड़ी 112 स्कूटियां, जिन्हें छात्राओं के सशक्तिकरण का प्रतीक होना था, आज व्यवस्था की उदासीनता के कारण धूल फांक रही हैं। इनमें से कई स्कूटियों की सीटें फटी हुई हैं और तकनीकी पार्ट्स जंग खा रहे हैं। जब इस बदहाली पर कॉलेज प्रशासन से जवाब मांगा गया, तो प्रिंसिपल डॉ. दीपक माहेश्वरी ने एक ऐसा तर्क दिया जो किसी के भी गले नहीं उतरता। उनका कहना है कि कॉलेज में आवारा कुत्तों ने स्कूटियों की सीटें फाड़ दीं।
यह बेहद शर्मनाक है कि एक उच्च शिक्षण संस्थान का प्रमुख अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय आवारा कुत्तों पर दोष मढ़कर पल्ला झाड़ रहा है। प्रशासन का यह कहना कि छात्राओं से ‘संपर्क नहीं हो पा रहा’, डिजिटल इंडिया के दौर में एक सफेद झूठ नजर आता है। क्या तीन सालों में कॉलेज प्रशासन एक पंजीकृत डाक या स्थानीय प्रशासन के जरिए छात्राओं तक नहीं पहुँच सका? सच तो यह है कि इन वाहनों को सुरक्षित रखने के लिए एक तिरपाल तक की व्यवस्था न करना प्रशासनिक अपराध की श्रेणी में आता है।
पद का अहंकार : छात्राओं को कहा ‘बीमारी’ और ‘कठपुतली’
इस लापरवाही के खिलाफ जब छात्राएं अपनी आवाज बुलंद करने प्रिंसिपल के पास पहुंचीं, तो समाधान मिलने के बजाय उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई गई। प्रदर्शनकारी छात्राओं का आरोप है कि प्रिंसिपल ने उनके साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए उन्हें ‘बीमारी’ और ‘दूसरों के हाथ की कठपुतली’ करार दिया। एक गुरु के मुख से अपनी शिष्याओं के लिए ऐसे शब्द निकलना शिक्षा के मंदिर की पवित्रता को कलंकित करता है। यह उस सामंती सोच का परिचायक है जो सवाल पूछने वाली बेटियों को सम्मान देने के बजाय उन्हें कुचलने में विश्वास रखती है।
रिजल्ट में गड़बड़ी और आर्थिक शोषण के गंभीर आरोप
छात्राओं का आक्रोश सिर्फ स्कूटी तक सीमित नहीं है। उन्होंने कॉलेज प्रशासन पर परीक्षा परिणामों में जानबूझकर धांधली करने का सनसनीखेज आरोप भी लगाया है। छात्राओं के अनुसार, बीए और बीएससी के सेमेस्टर रिजल्ट में बड़ी संख्या में छात्राओं को फेल किया गया है ताकि ‘रिवेल्यूएशन’ (पुनर्मूल्यांकन) के नाम पर उनसे मोटी रकम वसूली जा सके। दूर-दराज के आदिवासी अंचलों से आने वाली गरीब छात्राओं के लिए शिक्षा को इस तरह ‘वसूली का धंधा’ बनाना सरकारी तंत्र की नैतिक गिरावट को दर्शाता है।
हंगामा, तालाबंदी और पुलिस की दखल
प्रिंसिपल के अड़ियल रवैये और अपमानजनक टिप्पणी से गुस्साकर छात्राओं ने अंततः कॉलेज के मुख्य द्वार पर ताला जड़ दिया और प्रिंसिपल को उनके ही चैंबर में बंद कर दिया। घंटों चले इस ड्रामे और भारी नारेबाजी के बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। हालांकि पुलिस ने समझाइश कर ताला खुलवा दिया, लेकिन यह घटना इस बात की गवाह है कि जब संवाद के रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और जिम्मेदारी की जगह अहंकार ले लेता है, तो अराजकता का जन्म होना निश्चित है।
जवाबदेही कब तय होगी?
यह मामला केवल कुछ फटी हुई सीटों या धूल भरी स्कूटियों का नहीं है। यह मामला उस भरोसे के टूटने का है जो मेधावी छात्राएं सरकार और संस्थान पर करती हैं। क्या उन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने तीन साल तक इन वाहनों को सड़ने दिया? क्या उस भाषा के लिए माफी मांगी जाएगी जिसने बेटियों के मनोबल को तोड़ा है? उदयपुर का मीरा गर्ल्स कॉलेज आज प्रशासन से जवाब मांग रहा है, बहाने नहीं।
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