
उदयपुर। नियति कितनी क्रूर हो सकती है, इसका अंदाजा ऋषभदेव में हुए हादसे को देखकर लगाया जा सकता है। जिस घर में अभी महीने भर पहले शहनाइयां गूंजी थीं, जहां की देहरी पर अभी नई दुल्हन के लाल कदमों के निशान ताजे थे, आज वहां से चीखें और मातम की आवाजें आ रही हैं। कॉन्स्टेबल प्रवीण मीणा ने अपने फर्ज और परिवार के बीच उस ‘फर्ज’ को चुना, जिसके लिए उन्होंने खाकी वर्दी पहनी थी।
अभी बीती 10 फरवरी को ही प्रवीण का विवाह हुआ था। घर में उत्सव का माहौल था, नई गृहस्थी के सपने सजाए जा रहे थे। पत्नी के हाथों की मेहंदी का रंग अभी गहरा ही था कि प्रवीण को कर्तव्य ने पुकार लिया। वे एक अपराधी (स्थायी वारंटी) को पकड़ने के लिए अपनी टीम के साथ निकले थे। उन्हें क्या पता था कि जिस अपराधी को वे सलाखों के पीछे भेजने जा रहे हैं, वही सफर उनकी जिंदगी का आखिरी सफर साबित होगा।
नेशनल हाईवे-48 पर जब उनकी कार डिवाइडर से टकराई, तो वह सिर्फ एक लोहे की गाड़ी नहीं टूटी, बल्कि एक परिवार की उम्मीदें और एक पत्नी के वो सारे वादे टूट गए जो अग्नि के सात फेरों के साथ लिए गए थे। जिस हाथ में अभी कंगन और कलावा बंधा था, उस हाथ को अब राजकीय सम्मान के साथ तिरंगे में लिपटे प्रवीण को अंतिम विदाई देनी होगी।
प्रवीण मीणा चाहते तो अपनी खुशियों के दिनों का हवाला देकर छुट्टी बढ़ा सकते थे, लेकिन उन्होंने सेवा को सर्वोपरि रखा। एक अपराधी को समाज के लिए खतरा मानकर उसे पकड़ने की तत्परता ने आज उन्हें हमसे छीन लिया। ऋषभदेव का भूधर गांव आज अपने लाडले की शहादत पर गर्व तो कर रहा है, लेकिन उस सूनी मांग और बिलखते माता-पिता को देखने की हिम्मत किसी में नहीं है।
अंतिम विदाई : प्रवीण का पार्थिव शरीर जब तिरंगे में लिपटकर उनके गांव पहुंचेगा, तो हर आंख नम होगी। राजकीय सम्मान के साथ उन्हें विदा किया जाएगा, लेकिन समाज और विभाग हमेशा याद रखेगा कि एक जवान ने अपने संसार को बसने से पहले ही देश की सुरक्षा के लिए न्योछावर कर दिया।
नमन है उस वीर जवान को जिसने अपनी खुशियों से पहले हमारे सुकून को चुना।
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