
भीलवाड़ा। भीलवाड़ा की उस दहलीज़ पर, जहां कल तक किलकारियां गूंजती थीं, आज ऐसा सन्नाटा पसरा है जो कानों से नहीं, रूह से सुना जाता है। वह आंगन, जहां बच्चों के नन्हे पैरों की थाप थी, आज सवालों से भरा पड़ा है। सवाल यह नहीं कि क्या हुआ, सवाल यह है कि यह कैसे हो गया?

जो मां कल तक अपनी बेटी को गुड़िया की तरह सजाकर कैमरे के सामने मुस्कान सिखाती थी, जो अपने बेटे के मासूम क़दमों के साथ थिरकती थी—वही मां इतनी पत्थरदिल कैसे हो गई कि अपनी ही कोख के फल को मौत के हवाले कर दे?
इस सवाल का जवाब किसी घरेलू कलह, किसी दुश्मनी या किसी तात्कालिक ग़ुस्से में नहीं छिपा। इसका सच छिपा है उस डिजिटल नशे में, उस फेक इन्फॉर्मेशन के मकड़जाल में, जिसने धीरे-धीरे एक हंसते-खेलते घर को श्मशान में बदल दिया।
सोशल मीडिया : ज्ञान का स्रोत या मौत का फंदा?
सोशल मीडिया की चमक-दमक के पीछे एक ऐसा अंधेरा है, जो इंसान की सोच, विवेक और धैर्य—तीनों को निगल जाता है। संजू देवी का मामला सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि हमारे समय की एक भयावह चेतावनी है।
आधा ज्ञान, पूरा विनाश : 30 सेकंड की रील, कुछ अधूरी पंक्तियां और डर फैलाने वाले शब्द—इतना ही काफी था एक मां के मन में ‘कैंसर’ का ऐसा भूत बैठाने के लिए, जिसने उसे सच्चाई की जांच तक करने का मौका नहीं दिया। इंटरनेट ने हमें झूठा आत्मविश्वास दे दिया—हम सबको डॉक्टर बना दिया, पर इंसान बने रहने का धैर्य छीन लिया।
अल्गोरिदम का खौफ : आज सोशल मीडिया हमारे सवालों के जवाब नहीं देता, बल्कि हमारे डर को और गहरा करता है। बीमारी खोजो तो मौत दिखाई जाती है, दर्द खोजो तो अंत। संजू देवी उसी चक्रव्यूह में फंसती चली गई। उसे लगने लगा कि वह मर जाएगी, उसके बच्चे अनाथ हो जाएंगे—और इसी भ्रमित ममता ने उन्हें उस नींद में सुला दिया, जहां से कोई जागता नहीं।
वर्चुअल दुनिया बनाम हकीकत : यह विडंबना ही है कि जो हाथ कल तक बच्चों के साथ रील बनाते थे, वही हाथ रस्सी और कील उठा बैठे। सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘परफेक्ट लाइफ’ के पीछे मानसिक स्वास्थ्य कितना खोखला हो सकता है—यह घटना उसका क्रूर उदाहरण है।
मासूमों का क्या कसूर?
ज़रा उन बच्चों की कल्पना कीजिए—12 साल की नेहा, 7 साल का भैरू।
जिन्होंने अपनी मां की आंखों में आख़िरी बार ममता नहीं, बल्कि मौत का साया देखा होगा। जिस गोद में वे सुकून ढूंढते थे, उसी गोद ने उनकी साँसें छीन लीं। वह कील सिर्फ बच्चों के सीने में नहीं धंसी—वह कील हमारे समाज की संवेदनशीलता, समझ और जिम्मेदारी के सीने में ठोंकी गई है।
एक कड़वी चेतावनी : हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ गूगल और इंस्टाग्राम हमारे फैसलों का संचालन कर रहे हैं। याद रखिए—मोबाइल की स्क्रीन पर दिखने वाला हर सच, सत्य नहीं होता। किसी डर को पालने से पहले अपनों से बात कीजिए,
डॉक्टर से मिलिए, इलाज खोजिए— रील देखकर खुद ही अपनी और अपनों की जिंदगी का फ़ैसला मत कीजिए।
जब एक मां का प्यार डर, अंधविश्वास और डिजिटल भ्रम की भेंट चढ़ जाए, तो समझ लीजिए—हमारा समाज तकनीकी रूप से ‘डिजिटल’ तो हो गया है, लेकिन मानवीय रूप से ‘समझदार’ होना अभी बाकी है।
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