फोटो : कमल कुमावत

उदयपुर। सिनेमा के सुनहरे दौर में जब सलीम-जावेद किसी मल्टीस्टारर फ़िल्म का स्क्रीनप्ले लिखते थे, तो निर्देशक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं होती थी कि फ़िल्म कैसे बनेगी, बल्कि यह होती थी कि पोस्टर पर किस अदाकार का चेहरा बड़ा दिखेगा और स्क्रीन टाइम का बंटवारा कैसे होगा। ‘दीवार’ के अमिताभ बच्चन और शशि कपूर हों, या ‘शोले’ के जय और वीरू—जब दो समानांतर ताक़तें एक ही फ़्रेम में खड़ी होती हैं, तो दर्शक कहानी से ज़्यादा किरदारों की आपसी केमिस्ट्री और उनके भीतर की कशमकश को ताड़ते हैं।
झीलों की नगरी उदयपुर का नगर निगम टाउनहॉल इन दिनों ठीक वैसी ही किसी भव्य मल्टीस्टारर फ़िल्म के सेट में तब्दील हो चुका है।
गुरुवार को जब घड़ियों की सुइयों ने दोपहर के ठीक अभिजीत मुहूर्त को छुआ, तो दिनेशचंद्र भट्ट ने विधिवत उप-महापौर (डिप्टी मेयर) की आसंदी संभाल ली। पंडितों के मंत्रोच्चार, शंखनाद और समर्थकों के नारों के बीच यह महज़ एक दफ़्तर का कार्यभार नहीं था, यह उस मंझे हुए सह-कलाकार की ग्रैंड एंट्री थी जो परदे पर आते ही मुख्य नायक की चमक को चुनौती देने का माद्दा रखता है।

ज़रा मंच के किरदारों और पटकथा के समीकरणों को देखिए।
मुख्य भूमिका (लीड रोल) में हमारे पारस सिंघवी हैं, जिन्होंने कल ही भावुक होकर ‘शून्य से शिखर’ तक के सफ़र का डायलॉग बोला था। लेकिन ‘सेकंड लीड’ के रोल में आए दिनेश भट्ट कोई कमज़ोर मोहरा नहीं हैं। चुनाव के गुप्त मतदान में उन्होंने मेयर से भी ‘एक वोट ज़्यादा’ अपनी झोली में डालकर पहले ही सीन में सीटी बजाने पर मजबूर कर दिया था। और आज उनके इस राजतिलक को राष्ट्रीय आयाम देने खुद दिल्ली और जयपुर के सियासी गलियारों के दिग्गज, भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व राज्यसभा सांसद सतीश पूनिया विशेष रूप से मौजूद रहे। पूनिया का यूँ उदयपुर के निगम दफ़्तर में कदम रखना बताता है कि इस फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक सिर्फ़ स्थानीय नहीं हैं।

मगर ठहरिए, इस मल्टीस्टारर फ़िल्म की कास्टिंग यहीं ख़त्म नहीं होती।
बैकग्राउंड में प्रमोद सामर खड़े हैं—एक ऐसे मंझे हुए संजीदा अभिनेता की तरह, जो किसी भी वक्त अपने मोनोलॉग से पूरी महफ़िल लूटने की कुव्वत रखते हैं और जिनकी खामोशी भी स्क्रीन पर भारी पड़ती है। फिर पंजाब के महामहिम राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया साहब के दो क़रीबी रिश्तेदार भी बतौर पार्षद इसी मंडली का हिस्सा हैं, मानो उस पुराने घराने के प्रतिनिधि हों जिसकी छाया से मेवाड़ की राजनीति कभी पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाती। भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष अलका मूंदड़ा, ज़िलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़, पूर्व महापौरों की कतार—चेहरे इतने हैं कि निर्देशक को फ्रेम में जगह कम पड़ जाए।

मंच से संवाद बेहद सधे हुए थे। दिनेश भट्ट ने बड़े शाइस्ता अंदाज़ में कहा कि वे महापौर पारस सिंघवी के साथ ‘कंधे से कंधा मिलाकर’ चलेंगे। विकास की बात हुई, झीलों की अस्मिता की दुहाई दी गई, विरासत और आधुनिकता के संतुलन की चर्चा हुई। पारस जी ने भी गर्मजोशी से हाथ मिलाया और पूनिया जी ने समर्पण का पाठ पढ़ाया।
लेकिन जैसा कि सिनेमा का शाश्वत नियम है—जब किसी एक ही फ़िल्म में तीन-चार सुपरस्टार्स को ठूंस दिया जाए, तो दर्शकों के ज़हन में हमेशा यह कौतूहल बना रहता है कि क्या मुख्य हीरो अपने दम पर फ़िल्म को बॉक्स ऑफ़िस की वैतरणी पार करा पाएगा? या फिर हर सीन के बाद क्रेडिट लेने की होड़ मचेगी?

अभिजीत मुहूर्त में फ़िल्म का ‘मुहूर्त शॉट’ तो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बहुत शानदार रहा है। दर्शक दीर्घा में बैठी शहर की अवाम टकटकी लगाए देख रही है। मगर असली परीक्षा तब होगी जब रोज़मर्रा की बुनियादी समस्याओं, पानी के संकट और सीवरेज के गड्डों से भरी पटकथा पर यह सितारे अपनी अदाकारी दिखाएंगे। देखना दिलचस्प होगा कि तालियां किसके हिस्से में आती हैं और क्लाइमेक्स में निर्देशक किसे हीरो का दर्जा देता है।
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