
सैयद हबीब, उदयपुर।
सिनेमा के महान निर्देशक फेडरिको फेलिनी ने कभी कहा था कि सर्कस और राजनीति में रत्ती भर का फ़र्क़ नहीं होता; दोनों में ही तमाशबीन करतब देखकर ताली पीटते हैं, मगर असली खेल उस तंबू के पीछे होता है जहां जोकर अपना आंसू पोंछकर मुस्कुराने का मुखौटा पहन रहा होता है। उदयपुर नगर निगम के हालिया चुनावी दंगल ने मुझे फेलिनी की उसी बात की याद दिला दी।
मैं इस शहर के किसी गुमनाम वार्ड से चुनकर आया एक अदना-सा किरदार हूं। जैसे किसी मल्टीस्टारर फ़िल्म में मुख्य कलाकारों के पीछे खड़ा एक्स्ट्रा, जिसे न कोई बड़ा संवाद बोलना होता है, न कैमरे का क्लोज़-अप उस पर टिकता है। हमारी क़िस्मत बस भीड़ का हिस्सा बने रहने की होती है।
जीत का सेहरा अभी सिर पर बंधा ही था, गले में पड़ी गेंदे के फूलों की मालाएं सूखी भी नहीं थीं कि हुक्म हुआ—’बाड़े’ में चलना है। शाम ढलते ही हमें एक आलीशान क़ैदगाह में दाख़िल कर दिया गया। पहला वार हमारे उस छोटे-से यन्त्र पर हुआ, जिसे मोबाइल कहते हैं। वह ज़ब्त हुआ, तो लगा जैसे बाहरी दुनिया से नाभि-नाल ही काट दी गई हो।
शुरुआती पहर किसी राजश्री प्रोडक्शन की पारिवारिक फ़िल्म जैसा था। पुराने चुटकुलों पर ठहाके, चाय की चुस्कियों के साथ ज़ियाफ़त और वो बेफ़िक्री जो आम तौर पर संघर्ष के बाद मिलती है। मगर सियासत का स्क्रीनप्ले इतनी सादगी से आगे नहीं बढ़ता। दूसरे ही दिन से फ़िल्म का जॉनर बदल गया; कॉमेडी ने थ्रिलर का चोला ओढ़ लिया।
हवा में फुसफुसाहटें तैरने लगीं—’मेयर कौन? डिप्टी मेयर कौन?’
कम प्रभावी और सीधे-सादे पार्षद तो महज़ चाय के प्याले में तूफ़ान तलाश रहे थे, मगर जो खुद को शहंशाह समझ रहे थे, उनके माथों पर चिंता की लकीरें गहरी होती चली गईं। चेहरे का तनाव छुपाए नहीं छुप रहा था। जब सियासत में नफ़्स का तनाव बढ़ता है, तो हमारे यहां भगवान की शरण ली जाती है। तनाव दूर करने के बहाने हमें मंदिरों के दर्शन कराने ले जाया गया। हम हाथ जोड़कर ईश्वर के सामने खड़े थे, मगर बंद आंखों के पीछे ईश्वर नहीं, टाउनहॉल की कुर्सी तैर रही थी। जैसे ही बाड़े की चौखट में वापस क़दम रखा, वही संजीदा मुद्राएं और वही अंदरूनी कड़वाहट फिर चेहरे पर चिपक गई।
तीसरे रोज़ एक नया ड्रामा शुरू हुआ। सफेद पर्चियों पर तीन-तीन नाम लिखने का फ़रमान आया। लोकतंत्र का यह गुप्त मतदान दरअसल खुला तमाशा था। कोई कानाफूसी कर रहा था, कोई आंख के इशारे से बता रहा था कि स्याही किस नाम पर गिरनी चाहिए।
फिर पर्यवेक्षक आए। जब एक के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा नाम हवा में उछाला गया, तो कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया। मैंने अपनी ज़िंदगी में इंसानी फ़ितरत का ऐसा दोहरापन पहले कभी नहीं देखा था। जो शख़्स अकेले में कोने में ले जाकर किसी की शान में क़सीदे पढ़ रहा था, वही थोड़ी देर बाद महफ़िल में उसके ख़िलाफ़ ज़हर उगल रहा था। मंच के भाषणों के लफ़्ज़ कुछ और थे, और तन्हाई की साज़िशें कुछ और।
क्रॉस वोटिंग का ख़ौफ़ उस बंद हवेली के कमरों में प्रेत की तरह डोल रहा था।
मुझे हॉलीवुड की क्लासिक फ़िल्म ‘द गॉडफ़ादर’ का वह दृश्य याद आता है, जहाँ हर कोई अपने हाथ साफ़ रखते हुए काम तमाम करना चाहता है। यहाँ भी हर बड़ा खिलाड़ी बंदूक का ट्रिगर अपनी उंगली पर और निशाना अपनी आँख पर साधे बैठा था। उन्हें बस बंदूक टिकाने के लिए एक ‘मजबूत कंधा’ चाहिए था—एक ऐसा मोहरा जो कल को दाग़ अपने दामन पर ले ले। मगर बदक़िस्मती से कोई कंधा इतना वफ़ादार न निकला।
आख़िरकार पर्दा गिरा। क्लाइमेक्स में जिस नाम पर मुहर लगनी थी, लग गई। बाड़े से बाहर निकलकर सबने फिर वही कैमरे वाली बनावटी मुस्कान पहन ली। मुख़ालफ़त की राख में दबी चिंगारी आज भी सुलग रही है, मगर किसी में इतनी ताब नहीं कि उस डर की दीवार को लांघकर सच बोल सके।
यह कहानी किसी एक शहर की नहीं है। यह हर पाँच साल में दोहराया जाने वाला वही घिसा-पिटा मेलोड्रामा है, जिसकी स्क्रिप्ट पहले से तय होती है, मगर हर बार नए किरदारों को लगता है कि वो कोई नया इतिहास रच रहे हैं।
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