सड़क पर एक गलत मोड़ और खत्म हो गए तीन हंसते-खेलते परिवार : क्या सुरक्षा के दावों में कोई दम है?

उदयपुर। नियति कब, कहां और किस मोड़ पर घात लगाए बैठी है, कोई नहीं जानता। उदयपुर-पिंडवाड़ा नेशनल हाईवे पर गुरुवार रात जो हुआ, वह केवल एक एक्सीडेंट नहीं, बल्कि उन व्यवस्थाओं पर करारा तमाचा है जो सुरक्षित सफर का दम भरती हैं। अंबेरी पुलिया पर एक तेज रफ्तार कार के ट्रक में घुस जाने से तीन सरकारी कर्मचारियों की मौत ने एक बार फिर हाईवे सुरक्षा और संकेतक (Signage) व्यवस्थाओं पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

ACR की फाइलें तो भर गईं, पर जिंदगी का पन्ना कोरा रह गया

झालावाड़ के राधेश्याम (58) और रिटायर्ड वीडीओ कमल किशोर (60) अपनी सर्विस की एसीआर (ACR) भरवाने के उद्देश्य से उदयपुर आए थे। काम पूरा हुआ, चेहरे पर संतोष था और घर लौटने की जल्दी थी। साथ में जुड़ गया सहायक कर्मचारी हेमराज, जिसे क्या पता था कि वह अपनी मंजिल की तरफ नहीं, बल्कि मौत की तरफ कदम बढ़ा रहा है। वे महज 10 किलोमीटर रास्ता क्या भटके, पूरी जिंदगी का रास्ता ही बंद हो गया।

आखिर चूक कहां हुई? : हाईवे पर दिशा-निर्देशों का अभाव-सवाल यह है कि देबारी के पास क्या इतने स्पष्ट संकेत (Signage) लगे हैं जो रात के अंधेरे में अनजान चालक को सही रास्ता दिखा सकें? एक मामूली मानवीय चूक (रास्ता भटकना) इतनी बड़ी कीमत क्यों मांगती है?

तेज रफ्तार और सुरक्षा ऑडिट : अंबेरी पुलिया के पास अक्सर होने वाले हादसों के बावजूद क्या वहां पर्याप्त रोशनी या स्पीड कंट्रोल के उपाय किए गए हैं?

अंधेरे में गुम होती जिंदगी : रात सवा दस बजे जब पूरी दुनिया चैन की नींद की तैयारी कर रही थी, तब हाईवे पर लोहे के बीच दबी ये तीन जिंदगियां सिस्टम की सुस्ती और सड़कों की असुरक्षा का शिकार हो गईं।

क्या प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ मुआवजे का चेक बांटने तक सीमित है? क्यों हमारे हाईवे अनजान मुसाफिरों के लिए डेथ ट्रैप साबित हो रहे हैं?

नीट की परीक्षा देने वाले बेटे की बेसुध चीखें

हादसे का सबसे दर्दनाक पहलू अस्पताल की मॉर्च्युरी के बाहर दिखा। मृतक हेमराज के बेटे ने अभी कुछ ही दिन पहले नीट (NEET) की परीक्षा दी थी। वह डॉक्टर बनकर पिता का सहारा बनने का सपना देख रहा था, लेकिन शुक्रवार शाम जब उसने अपने पिता का बेजान शरीर देखा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

बीडीओ जितेंद्र सिंह ने उन्हें रुकने के लिए कहा था, काश वे रुक जाते… यह ‘काश’ अब उनके परिजनों की पूरी जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द बन चुका है।

यह हादसा हमें याद दिलाता है कि सड़कों पर सुरक्षा केवल नियमों की किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जब तक हमारे हाईवेज पर स्पष्ट संकेतक, बेहतर रोशनी और आपातकालीन सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होंगे, तब तक ऐसे ही मासूम परिवार लापरवाही और ‘रास्ता भटकने’ जैसी छोटी गलतियों की भारी कीमत चुकाते रहेंगे।

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