उदयपुर | जब हौसलों में उड़ान और इरादों में फौलाद जैसी मजबूती हो, तो शारीरिक अक्षमता भी घुटने टेक देती है। झीलों की नगरी उदयपुर के भावेश देसाई ने इस बात को हकीकत में बदल दिया है। आँखों की रोशनी न होने के बावजूद, भावेश ने आरएएस (RAS) परीक्षा-2024 के परिणाम में वह मुकाम हासिल किया है, जो करोड़ों आँखों का सपना होता है।
दृष्टि की सीमा लांघी, मेधा से रचा नया कीर्तिमान
वर्तमान में एक तृतीय श्रेणी शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे भावेश देसाई के लिए यह सफर काँटों भरा था। दुनिया को देख न पाने की मजबूरी को उन्होंने कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। भावेश ने अपनी कड़ी मेहनत के बल पर अनुसूचित क्षेत्र (TSP) के सामान्य वर्ग में 97वीं रैंक प्राप्त की, वहीं दृष्टि दिव्यांग श्रेणी में वे पूरे राजस्थान में दूसरे स्थान पर रहे। उनकी इस सफलता ने साबित कर दिया कि मंजिल पाने के लिए आँखों की नहीं, विज़न (दृष्टिकोण) की जरूरत होती है।
समिधा संस्थान: जहाँ अभावों के बीच गढ़े जाते हैं प्रभाव
भावेश की इस सफलता के पीछे सेक्टर-14 स्थित समिधा दृष्टि दिव्यांग मिशन की तपस्या भी शामिल है। संस्थान के अध्यक्ष डॉ. चंद्रगुप्त सिंह चौहान ने भावुक होते हुए बताया कि यह छात्रावास केवल एक इमारत नहीं, बल्कि उन बच्चों के सपनों का घर है जिन्हें समाज अक्सर हाशिए पर छोड़ देता है।
अत्यंत मार्मिक पहलू यह है कि यह छात्रावास बिना किसी सरकारी मदद के, केवल समाज के दानदाताओं और वॉलंटियर्स के सहयोग से चल रहा है। जिस भवन में आज भविष्य के प्रशासनिक अधिकारी गढ़े जा रहे हैं, वह कभी एक खंडहर था। संस्थान ने उस जर्जर इमारत का कायाकल्प कर उसे शिक्षा का मंदिर बना दिया, ताकि भावेश जैसे प्रतिभाशाली युवा आत्मनिर्भर बन सकें।
संघर्षों को सलाम: “आने वाली पीढ़ियों के लिए मशाल हैं भावेश”
भावेश की सफलता की खबर मिलते ही दृष्टिबाधित छात्रावास में खुशियों का सैलाब उमड़ पड़ा। दृष्टिबाधित साथी एक-दूसरे को गले लगाकर ऐसे झूम रहे थे, मानो जीत उन सबकी हुई हो। भावेश देसाई की यह उपलब्धि उन सभी के लिए एक करारा जवाब है जो दिव्यांगता को बेबसी समझते हैं।
समिधा संस्थान ने उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि भावेश की यह जीत आने वाली कई पीढ़ियों के लिए एक जलती हुई मशाल का काम करेगी, जो उन्हें कभी हार न मानने की प्रेरणा देगी।
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