झीलों के शहर में प्यास की नौटंकी और सड़े हुए पाइप

सैयद हबीब, उदयपुर

 

हमारे मुल्क में जल-संकट कोई प्राकृतिक विपदा नहीं, बल्कि एक सुरुचिपूर्ण सामूहिक पाखंड है। जब बादल नहीं बरसते, तो सरकार से लेकर जनता तक सब अचानक दार्शनिक हो जाते हैं। उदयपुर, जिसे ब्रोशरों और टूरिस्ट गाइडों की जबान में ‘झीलों की नगरी’ और ‘वेनिस ऑफ द ईस्ट’ कहकर बेचा जाता है, वहाँ आजकल यह तमाशा अपने पूरे शबाब पर है।

साल 2005 की फतहसागर और पिछोला की ये तस्वीरें देख लीजिए। तब लगातार दस बरसों से अकाल का दौर था। न मानसी वाकल का ढोल पीटा गया था, न देवास द्वितीय की सुरंगें खुदी थीं। फिर भी शहर की सूखी नसों में हर दूसरे दिन पानी टपक ही जाता था। मगर इक्कीसवीं सदी के इस इक्कीसवें-छब्बीसवें साल में जब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली कि फाइलों में नदियां बहने लगी हैं, सिर्फ एक साल बादल रूठ गए और जलदाय विभाग की घिग्घी बंध गई। विभाग ने हाथ खड़े कर दिए और कह दिया—”लो भाई, अब तीसरे दिन पानी पियो, क्योंकि हमारे पास गणित है।”

सरकारी महकमों का गणित हमेशा तब बाहर आता है जब उनके पास काम करने की नीयत खत्म हो जाती है। जब पानी था, तब अफसरशाही सो रही थी। अब जब कंठ सूखने लगे हैं, तो वे चार्ट और ग्राफ लेकर बैठ गए हैं कि पानी क्यों नहीं दिया जा सकता।

मगर इसमें सारा कसूर सिर्फ हुक्मरानों का ही नहीं है; हमारी जागरूक जनता भी कम पापी नहीं है। पिछले बीस बरसों में इस शहर के भले नागरिकों ने पानी की जो कद्र की है, उस पर इतिहास थूकेगा। जिस दिन नल में पानी आता, शहर के सभ्य नागरिक अपनी कारों और मोटरसाइकिलों को ऐसे नहलाते थे जैसे उनका अंतिम संस्कार कर रहे हों। पाइप का मुंह दबाकर आधी सड़क धो डाली जाती थी ताकि पड़ोसियों को पता चले कि इनके घर में प्रेशर कितना ज्यादा है। पानी की बर्बादी को हमने अपनी अमीरी और रसूख का पैमाना बना लिया। अब जब तीसरे दिन नलों में से केवल हवा की सीटी बज रही है, तो वही नागरिक चौराहे पर खड़े होकर पूछ रहे हैं—”प्रशासन क्या कर रहा है?”

प्रशासन वही कर रहा है जो वह हमेशा करता है—सियासत।

शहर के विधायक ताराचंद जी जैन लगातार कोशिश कर रहे हैं कि जलापूर्ति 48 घंटे में हो जाए। वे जनता के दर्द में दुबले हुए जा रहे हैं, क्योंकि चुनाव में वोट तो प्यासी जनता ही देती है। लेकिन जलदाय विभाग ने उन्हें भी मौजूदा पानी का ऐसा तिलिस्म समझाया है कि नेताजी का आश्वासन फाइलों की गहराई में डूब गया है। विभाग ने जो प्लान बनाए, वे राजधानी के दफ्तरों में धूल फांक रहे हैं। जब प्यास बुझाने के लिए योजना बनानी हो, तो हमारे यहां फाइलें ऐसे रेंगती हैं जैसे कछुआ रिटायरमेंट की अर्जी लेकर जा रहा हो।

और सबसे बड़ा व्यंग्य तो जयसमंद की उस ऐतिहासिक पाइपलाइन पर है, जो कभी संकट मोचन हुआ करती थी। बीस सालों के ‘विकास’ ने उस पाइपलाइन को ऐसा खाया कि वह या तो सड़ चुकी है या उखाड़कर कबाड़ में तब्दील हो चुकी है। अब जब अकाल का जिन्न सामने खड़ा है, तो हुक्मरानों को याद आया कि अरे, एक पाइपलाइन भी तो थी! अब उसे दोबारा डालने के टेंडर छूटेंगे, कमीशन बटेंगे, और जब तक नई पाइपलाइन डलेगी, तब तक शायद दो और मानसून बीत जाएंगे।

इधर जयसमंद क्षेत्र के लोगों की अपनी राष्ट्रभक्ति जाग उठी है। वे अड़ गए हैं कि जब तक जाखम का पानी जयसमंद नहीं आएगा, तब तक हम अपनी एक बूंद उदयपुर को नहीं देंगे। यह हमारे देश का सबसे लोकप्रिय संघीय ढांचा है—मेरा पानी मेरा है, तुम्हारा सूखा तुम्हारा है।

कुल मिलाकर दृश्य मनोरम है। झीलें सूखकर मैदान बन चुकी हैं, महकमा कागजी हिसाब में मशगूल है, नेताजी मिन्नतें कर रहे हैं, जनता खाली बाल्टियों के साथ अपनी पिछली अय्याशियों का हिसाब चुका रही है, और जयसमंद के किनारे खड़े लोग अपनी बाउंड्री खींच रहे हैं। प्रकृति चुपचाप कोने में बैठकर हंस रही है और कह रही है—”बेटा, जब तक पानी था, तब तक तुमने उसे बहाया; अब जब नहीं है, तो एक-दूसरे का खून बहाकर प्यास बुझा लो।”

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