
उदयपुर। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा बुधवार को उदयपुर आए, जिला परिषद में अधिकारियों के साथ बड़ी-बड़ी बातें हुईं, समीक्षा बैठक का तामझाम सजा, लेकिन हासिल क्या हुआ? वही ढाक के तीन पात। शहर का दुर्भाग्य देखिए कि दुनिया के सबसे पसंदीदा शहरों में शुमार उदयपुर के लिए विजन की बात होनी चाहिए थी, लेकिन बात सिमट कर रह गई लेपर्ड के मूवमेंट, पशु चिकित्सालय की शिफ्टिंग और बलीचा में एक अदद ट्रोमा सेंटर तक। ये मुद्दे भी बेचारे स्थानीय विधायकों ने उठाए, वरना सरकारी एजेंडे में तो शायद ये भी नहीं होते।
सच तो यह है कि उदयपुर के पास आज जो कुछ भी है, वह पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया की दूरदर्शिता की देन है। उनके बाद भैरो सिंह शेखावत से लेकर अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे तक, मुख्यमंत्रियों का उदयपुर आना-जाना तो लगा रहा, लेकिन किसी ने इस शहर को वह नहीं दिया जिसका यह हकदार था। उदयपुर के लोगों के सीने में यह दर्द दबा है कि करोड़ों खर्चने के बाद भी झीलों में आज भी नाले गिर रहे हैं। स्मार्ट सिटी के नाम पर शहर को ऐसा उलझाया गया कि अब लोगों का जीना दूभर हो गया है। वायरलेस सिटी का सपना अब तक कागजों से बाहर नहीं निकल पाया।
आयड़ का ‘सफेद हाथी’ और सिस्टम की लाचारी
हैरानी की बात है कि सीएम को शहर का वह ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ आयड़ नदी दिखाने कोई नहीं ले गया, जहां जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए पानी में बहा दिए गए। आरएनटी मेडिकल कॉलेज और एमबी अस्पताल में मरीजों का रेला लगा है, लेकिन इन्हें एम्स जैसा बनाने की इच्छाशक्ति किसी सरकार ने नहीं दिखाई। मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने या उदयपुर को आईटी हब बनाने जैसे बड़े विजन पर इस बैठक में चुप्पी ही छाई रही। इंटरनेशनल एयरपोर्ट की बातें तो अब चुटकुला लगने लगी हैं।
वकीलों की मांग और 40 साल का इंतजार
वकीलों ने एक बार फिर नए सीएम के सामने हाईकोर्ट बेंच की मांग रखी, लेकिन यह भी अब एक रस्म अदायगी जैसी लगने लगी है। 40 सालों से चल रहे इस आंदोलन के कितने ज्ञापन रद्दी की टोकरी में गए, इसका कोई हिसाब नहीं है। हर बार की तरह इस बार भी सीएम तक बात पहुंची, पर नतीजा वही—शून्य। अगर मुख्यमंत्री अधिकारियों के बजाय सीधे शहर की जनता से मिलते, तो शायद उन्हें फीडबैक मिलता कि उदयपुर के लोग सरकार और सिस्टम के बारे में असल में क्या सोचते हैं।
बैठक में हुई ये अहम बातें— “भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप ब्लूप्रिंट तैयार करें,” “लोकसेवक जनता के प्रति जवाबदेह हों।” देवास परियोजना को लेकर फिर से वही उम्मीदें जगाई गई हैं कि पानी की कमी नहीं रहेगी। ट्रैफिक सुधारने के लिए एआई (AI) के इस्तेमाल पर अपनी ही पीठ थपथपाई गई है। लेकिन हकीकत यही है कि जब तक बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बजट और विजन नहीं होगा, उदयपुर के लिए ये दौरे सिर्फ ‘पर्यटन’ बनकर ही रह जाएंगे।
कुल मिलाकर, बैठक खत्म हुई, मुख्यमंत्री चले गए, और उदयपुर के हिस्से में फिर से वही पुराना इंतजार और फाइलों का ढेर रह गया।
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