
सैयद हबीब/कमल कुमावत, उदयपुर
सिनेमा के किसी क्लोज-अप शॉट की तरह जिंदगी जब अचानक डगमगाती है, तो इंसान बदहवास होकर भागता है। सामने अस्पताल का वह दरवाजा होता है जिसके ऊपर लाल बत्ती जल रही होती है—’इमरजेंसी’। एक ऐसा कोना, जहां मिनटों का मोल सांसों से तौला जाता है। मरीज की फटी-फटी आंखें, माथे पर ठंडा पसीना और साथ खड़े तीमारदार का कांपता हुआ हाथ—यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि हमारे समाज की वह नंगी हकीकत है जो हर रोज किसी न किसी के हिस्से आती है। मगर अफसोस कि उस दहलीज के भीतर कदम रखते ही करुणा के बजाय फाइलों की सरसराहट और मशीनी बेरुखी का पर्दा गिर जाता है।
सवाल बहुत सादा है, मगर इस मुल्क की पूरी चिकित्सा व्यवस्था के सीने में तीर की तरह चुभता है: क्या किसी तड़पते इंसान को पहली दवा देने के लिए भी पैथोलॉजी की हरी झंडी का इंतजार जरूरी है?
पिछले दिनों अपने एक अज़ीज़ दोस्त (हमारे फोटो जर्नलिस्ट कमल कुमावत) के साथ जब उदयपुर के एमबी अस्पताल की कैजुअल्टी में खड़ा था, तो भीतर तक सिहर उठा। दोस्त को चक्कर आ रहे थे, उल्टियां रुक नहीं रही थीं। अतीत का एक घाव पहले से दर्ज था—बाईपास सर्जरी हो चुकी थी, यानी दिल का मामला किसी भी मोड़ पर खतरनाक रुख अख्तियार कर सकता था। ऐसे में उम्मीद यही थी कि कोई मसीहा आएगा, स्टेथॉस्कोप रखकर नब्ज पर उंगली रखेगा और पहले उस तूफ़ान को थामेगा जो जिस्म को झकझोर रहा था।
मगर हमारे अस्पतालों में ‘क्लिनिकल टच’ की जगह अब ‘इन्वेस्टिगेशन स्लिप’ ने ले ली है। डॉक्टर साहब ने देखा, पेन चलाया और ईसीजी व शुगर की जांच का फरमान थमा दिया। उसके बाद शुरू हुआ उस ठंडे गलियारे का अंतहीन इंतजार। सुइयां चुभोई गईं, खून के नमूने लिए गए, फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक रेंगती रहीं। लगभग एक घंटा उस लाचार मरीज ने तड़पते हुए काटा और बाहर खड़ा तीमारदार हर गुजरते सेकंड में अपनी उम्मीदों को मरते देखता रहा।
घंटे भर बाद जब तमाम टेस्टों के आंकड़े कागज़ पर दर्ज होकर आए, तब मरीज को वार्ड में शिफ्ट किया गया। वहां एक नौजवान रेजिडेंट डॉक्टर ने देखा और मरीज की वही पुरानी बीपी की गोली, जिसे वह बरसों से ले रहे थे, उसकी एक खुराक बढ़ाकर मुंह में रखवा दी। चंद पलों में दवा ने असर दिखाया और चेहरे पर बिखरी मौत जैसी स्याही छंटने लगी।
चेहरे पर रंग तो लौट आया, मगर दिल में एक टीस गहरी हो गई। जो राहत वार्ड के बेड पर एक मामूली गोली से मिलनी थी, क्या उस राहत की पहली घूंट इमरजेंसी की उस शुरुआती टेबल पर नहीं पिलाई जा सकती थी? क्या वह एक घंटा, जो दर्द और खौफ के दो पाटों के बीच पिसते हुए बीता, उसे टाला नहीं जा सकता था?
चार्ली चैपलिन ने कभी कहा था कि जिंदगी दूर से देखो तो कॉमेडी है, मगर क्लोज-अप में देखो तो ट्रेजेडी। इमरजेंसी का वह टेबल दरअसल उसी ट्रेजेडी का मंच बन गया है। हम जानते हैं कि डॉक्टर भगवान नहीं होते, वे भी नियमों और कानूनी प्रोटोकॉल की जंजीरों में बंधे हैं। ‘डिफेंसिव मेडिसिन’ के इस दौर में शायद वे अपनी चमड़ी बचाने के लिए पहले रिपोर्ट मांगते हैं। लेकिन दवा की किताब से बड़ा भी एक कायदा होता है—इंसानियत का कायदा।
जब तक हमारा सिस्टम जांच की रसीदों से ऊपर उठकर मरीज की चीख को पहले सुनना नहीं सीखेगा, तब तक इमरजेंसी के वे चमकते शीशे महज एक भ्रम बने रहेंगे। हम तो खैर अदना से नागरिक हैं, चुप रहने का शऊर ही हमारे हिस्से आता है; लेकिन अस्पताल के एयर-कंडीशंड कमरों में बैठे योजनाकारों को कभी खुद से यह पूछना चाहिए कि अगर उस स्ट्रेचर पर उनका अपना कोई होता, तो क्या वे भी रिपोर्ट आने तक सांसें रोककर इंतजार कर पाते?
