
उदयपुर। राजनीति जब जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत कुंठाओं का हिसाब चुकता करने का मंच बन जाए, तो जनता को विकास नहीं, केवल ‘मनोरंजन’ मिलता है। उदयपुर भाजपा में पिछले कुछ दिनों से जो ‘लेटर वॉर’ चल रहा है, वह इसी सस्ती लोकप्रियता और दिशाहीन राजनीति का सबसे भद्दा उदाहरण है। जिस ऊर्जा का इस्तेमाल शहर की बदहाली दूर करने और प्रशासन की नकेल कसने में होना चाहिए था, उसे दिग्गज नेता एक-दूसरे के चरित्र हनन और पुराने जख्मों को कुरेदने में बर्बाद कर रहे हैं।
चिट्ठियों में ‘सियासी अखाड़ा’, मैदान में सन्नाटा
उदयपुर की सियासत अब ड्राइंग रूम और सोशल मीडिया तक सिमट गई है। पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी और पूर्व जिलाध्यक्ष मांगीलाल जोशी के बीच छिड़ी यह जंग कोई वैचारिक लड़ाई नहीं, बल्कि अहंकार का टकराव है। 20 सालों से जो चिट्ठियों का दौर चल रहा है, उसने न तो पार्टी को मजबूती दी और न ही उदयपुर को कोई विजन दिया। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि जब ये दोनों नेता जनता के बीच होते थे तो लोगों की भीड़ जमा होती थी। जितना भी समय उन्होंने लोगों के दुख दर्द में बांटा है, उसी वजह से आज वो खड़े हैं।
कड़वा सच: राजनीति में मुकाबले जनता के बीच पसीने बहाकर जीते जाते हैं, बंद कमरों में जहरीली चिट्ठियां लिखकर नहीं। आज उदयपुर का कोई भी बड़ा नेता जनता की बुनियादी लड़ाई लड़ने के लिए सड़क पर नहीं दिखाई दे रहा।
बदहाल उदयपुर : ‘स्मार्ट’ फाइलों के नीचे दबी सिसकियां
नेताओं के लेटरहेड पर स्याही तो बहुत बह रही है, लेकिन शहर के उन नालों को रोकने की इच्छाशक्ति किसी में नहीं है जो आज भी हमारी ‘झीलों की नगरी’ की साख को गंदा कर रहे हैं।
करोड़ों का ‘स्मार्ट’ खेल: स्मार्ट सिटी के नाम पर बजट की जो बंदरबांट हुई, उस पर ये नेता मौन क्यों हैं? क्या विकास के नाम पर हुए इस “खेल” में इन नेताओं की चुप्पी किसी समझौते का हिस्सा है?
सड़ती व्यवस्थाएं: रोडवेज बस स्टैंड की हालत किसी खंडहर जैसी हो चुकी है, परकोटे के भीतर की जनता जाम और प्रदूषण से त्रस्त है। लेकिन नेताओं को फिक्र इस बात की है कि 1998 में किसने किसका टिकट काटा और किसने विप्र फाउंडेशन के भोज में ₹100 नहीं दिए।
प्रशासनिक तानाशाही: जब नेता आपस में लड़ते हैं, तो अफसरशाही बेखौफ हो जाती है। उदयपुर का प्रशासन आज बेलगाम है क्योंकि उसे झकझोरने वाला कोई राजनीतिक ‘कद’ मैदान में खड़ा ही नहीं है।
गढ़े मुर्दे उखाड़ने से पेट नहीं भरता
धर्मनारायण जोशी ने पत्र में ‘राजनीतिक कुंवारेपन’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर व्यक्तिगत हमला तो कर दिया, लेकिन क्या वे या उनके विरोधी यह बता सकते हैं कि इस आपसी खींचतान से उदयपुर के एक भी युवा को रोजगार मिला या एक भी नाला बंद हुआ?
यह उदयपुर का दुर्भाग्य है कि यहाँ की राजनीति ‘फौजमार सेनापतियों’ के हाथ में है, जो अपनी ही पार्टी की साख को ‘शहीद’ करने पर तुले हैं। जनता इन चिट्ठियों के चटकारे तो ले रही है, लेकिन भीतर ही भीतर उस नेतृत्व को कोस भी रही है जिसे उनके दुखों से कोई सरोकार नहीं है।
नेता चाहिए, डाकिया नहीं
उदयपुर को आज ऐसे नेताओं की जरूरत नहीं है जो एक-दूसरे की जन्मकुंडली सार्वजनिक करें, बल्कि ऐसे जुझारू व्यक्तित्व की जरूरत है जो सरकार की आंखों में आंखें डालकर शहर के हक की बात कर सके। अगर ये दिग्गज अपनी ‘चिट्ठी-पत्री’ से बाहर नहीं निकले, तो आने वाला वक्त इन्हें इतिहास के उन पन्नों में दर्ज कर देगा जिनका जिक्र सिर्फ ‘नकारात्मक राजनीति’ के उदाहरण के तौर पर होगा।
सवाल अब भी खड़ा है : क्या इन नेताओं के पास शहर की समस्याओं के लिए भी कोई पत्र है, या सारी स्याही आपसी रंजिश में ही खत्म हो जाएगी?
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