दास्तान-ए-मौसीक़ी : उदयपुर की वादियों में सुरों का लश्कर और ‘शायराना’ की पन्द्रहवीं मंज़िल

उदयपुर | झीलों की नगरी उदयपुर, जो अपनी नज़ाकत के लिए मशहूर है, हाल ही में एक ऐसी अज़ीम-ओ-शान नशिस्त (महान बैठक) की गवाह बनी जहां सात सुरों ने मानों ज़मीन पर आसमां उतार दिया। ‘शायराना उदयपुर’ की यह राज्य स्तरीय संगीत महफ़िल महज़ एक जलसा नहीं, बल्कि मौसीक़ी की इबादत का वो सलीक़ा था, जिसे गुज़श्ता 15 बरसों से नि:स्वार्थ जज़्बे के साथ सींचा जा रहा है।

पंडित राम कृष्ण बोस : संतूर के तारों पर रूह का रक़्स (नृत्य)

समारोह के ‘सद्र-ए-मजलिस’ और आलमी शोहरत याफ़्ता पंडित राम कृष्ण बोस ने जब अपने मख़सूस संतूर पर मिज़राब (चोट) मारी, तो ऐसा लगा जैसे वक़्त ठहर गया हो। उन्होंने ‘राग मालकोश’ का चुनाव कर शाम की संजीदगी को एक नई गहराई अता की। राग की ‘न्यास के स्वर’ और ‘गमक’ का ऐसा तालमेल था कि सभागार का कोना-कोना ‘वज्द’ (परमानंद) की स्थिति में आ गया।

पंडित जी ने जब ‘त्रिवट’ और ‘चतुरंग’ की बंदिशें पेश कीं, जिनमें बोल, तराना, और सरगम का बेमिसाल संगम होता है, तो शास्त्रीय संगीत के जानकारों ने इसे एक ‘इल्हामी’ (ईश्वरीय) प्रस्तुति क़रार दिया। उनके संतूर से निकली मींड (Sliding notes) ने फ़िल्मी गीतों को भी शास्त्रीय लिबास पहनाकर रूहानी बना दिया।

 

फ़नकारों का इम्तिहान : ‘शायराना’ के मंच पर सुरों की जंग

राजस्थान के कोने-कोने से आए 60 से अधिक ज़हीन फनकारों ने अपनी ‘लयकारी’ और ‘तैयारी’ का मुज़ाहिरा किया। यह महज़ प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि अपनी रियाज़ (अभ्यास) को पेश करने का एक पाक मंच था:

हेमराज गंधर्व : अपनी आवाज़ में मौजूद ‘लोच’ और ‘मुरकियों’ की बारीकी की वजह से इस महफ़िल के ‘शहंशाह-ए-ग़ज़ल’ बनकर उभरे।

महेंद्र कुमावत (राजसमंद) : उनकी आवाज़ के ठहराव ने उन्हें दूसरे मुक़ाम पर फ़ाइज़ किया।

डॉ. प्रेमलता शर्मा : अपनी सधी हुई गायकी के ज़रिए तीसरा स्थान हासिल कर उन्होंने स्त्री-शक्ति की कलात्मक मौजूदगी दर्ज कराई।

असातिज़ा (उस्तादों) की सोहबत : जहाँ निर्णायक ही रहबर बन गए
इस महफ़िल की सबसे ख़ूबसूरत रिवायत यह रही कि यहाँ जजों ने महज़ नंबर नहीं दिए, बल्कि अपनी कला से ‘शमा’ रौशन की:

देवयानी सेनगुप्ता ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के ‘आनंद लोक’ को जब अपनी आवाज़ दी, तो ऐसा महसूस हुआ जैसे शांति का कोई दरिया बह रहा हो।

आभा सिरसीकर के भजनों में जो ‘सोज़’ (तड़प) और ‘इबादत’ थी, उसने महफ़िल को एक दरगाह जैसी पाकीज़गी बख़्श दी।

डॉ. सीमा सिंह और फ़य्याज़ ख़ां : इन दोनों की ‘हमनवाई’ (जुगलबंदी) ने ग़ज़ल की अदायगी और लफ़्ज़ों के रख-रखाव के वो गुर सिखाए, जो दशकों की साधना से आते हैं।

मुंबई के मनोज पोरवाल और डॉ. देवेंद्र सिंह हिरण ने नौजवान नस्ल को ‘सुर के लगाव’ और ‘आवाज़ के रख-रखाव’ की पेचीदगियाँ समझाईं।

तारीख़ और तरन्नुम का संगम : 21,000 फीट का ख़िराज-ए-अक़ीदत

जहाँ एक तरफ़ कानों में रस घुल रहा था, वहीं दूसरी तरफ़ मनोज आंचलिया और डॉ. सीमा वेद ने 21,000 फीट लंबे कपड़े पर उकेरी गई आज़ादी की दास्तान के ज़रिए आँखों को नम और सीनों को फ़ख्र से चौड़ा कर दिया। संगीत की कोमलता और शहीदों की वीरगाथा की शहादत का यह संगम यक़ीनन तारीख़ी (ऐतिहासिक) था।

हर्फ़-ए-आख़िर (अंतिम शब्द)

जनाब दिनेश कोठारी की सरपरस्ती और डॉ. प्रेमलता शर्मा व मनोज आंचलिया की मखमली निज़ामत (एंकरिंग) ने इस प्रोग्राम को चार चाँद लगा दिए। मुंतज़मीन (आयोजकों) मनीष जोशी और ललित गोयल ने साबित कर दिया कि उदयपुर की मिट्टी में आज भी वो कशिश है, जो सात सुरों को एक सूत्र में पिरोकर ‘इंसानियत’ का नग़्मा सुना सकती है।

हासिल-ए-महफ़िल : यह शाम गुज़र गई, मगर इसकी गूंज उदयपुर के साज़ों में ता-उम्र ज़िंदा रहेगी।

About Author

Leave a Reply