
उदयपुर। कभी-कभी नियति इतनी निष्ठुर हो जाती है कि इंसान का भरोसा, उसकी आस्था और उसका ईश्वर—सब एक साथ टूट जाते हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक मां और बेटी, दिल में श्रद्धा और आंखों में उम्मीदें लेकर मेवाड़ की पवित्र धरती पर आई थीं। सोच रही थीं—श्रीनाथजी के दर्शन होंगे, मन हल्का होगा, जीवन फिर से संवर जाएगा। लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस धरती पर वे दुआ मांगने आई हैं, वही धरती कुछ ही पलों में मां की चिता बन जाएगी।
दर्शन के बाद बिखर गई ज़िंदगी
सोमवार की दोपहर गोगुंदा-पिंडवाड़ा हाईवे पर मौत ने कोई चेतावनी नहीं दी। वह एक बेकाबू ट्रेलर बनकर आई—न इंसानियत देखी, न उम्र, न ममता।
55 वर्षीय अनिता यादव अपनी बेटी निधि के साथ घसियार स्थित श्रीनाथजी के दर्शन कर लौटी थीं। चेहरे पर शांति थी, मन में संतोष। लेकिन जैसे ही वे सड़क पार करने लगीं, रफ्तार ने सब कुछ रौंद दिया।
टक्कर इतनी भयावह थी कि 50 मीटर तक मां की देह के टुकड़े बिखर गए—जैसे किसी ने ममता को चाकू से काटकर सड़क पर फेंक दिया हो। सवाल यह नहीं कि मौत आई, सवाल यह है कि इतनी बेकाबू रफ्तार को किसने इजाज़त दी?
“मम्मी… उठो ना…” — वक्त जैसे थम गया
हादसे के बाद जब निधि दौड़ती हुई वहां पहुंची, तो वक्त जैसे थम गया।
सड़क पर लहूलुहान पड़ी मां… और उस पर गिरती बेटी की बेबस देह।
वह मां के शव से लिपटकर रो रही थी, झकझोर रही थी—
“मम्मी… एक बार तो आंखें खोलो… देखो, मैं यहीं हूं…”
उसकी चीखों में सिर्फ दुख नहीं था, एक सवाल भी था—
क्या आस्था की इस यात्रा की यही कीमत थी?
जिस मां के साथ वह सुबह हंसते-हंसते मंदिर गई थी, उसी मां की सांसें अब उसकी बाहों में खत्म हो रही थीं। वहां खड़े लोग रो रहे थे, लेकिन कोई उस बेटी को वह जवाब नहीं दे पा रहा था, जो उसकी आंखों में जलते अंगारों की तरह था।
रफ्तार बच गई, इंसानियत भाग गई
हादसे के बाद ट्रेलर चालक मौके से फरार हो गया। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, यह कायरता की पराकाष्ठा है। पुलिस आई, शव मोर्चरी पहुंचाया गया, कार्रवाई की बात कही गई। लेकिन सवाल वही है—क्या एक एफआईआर उस बेटी को उसकी मां लौटा देगी?
क्या सीसीटीवी फुटेज उसकी टूटी दुनिया को जोड़ पाएगा?
बड़गांव थानाधिकारी ने मीडिया के सामने औपचारिक बयान दिया, प्रशासन ने संवेदना जताई। लेकिन संवेदनाएं तब खोखली लगती हैं, जब सड़कें हर रोज लाशें मांगती हों और सिस्टम आंखें मूंदे बैठा हो।
सवाल जो सिस्टम से टकराते हैं
मेवाड़ की सड़कें पर्यटकों के स्वागत के लिए जानी जाती हैं, लेकिन सोमवार को वही सड़कें एक मां के खून से रंगी थीं। हर हादसे के बाद वही रटा-रटाया बयान—
जांच होगी… दोषी पकड़ा जाएगा… कार्रवाई होगी…
लेकिन सवाल यह है—
बेकाबू ट्रेलरों पर लगाम कब लगेगी? तीर्थ स्थलों के पास सुरक्षा कब जागेगी? और कितनी बेटियां अपनी मां की लाश से लिपटकर रोएंगी, तब जाकर रफ्तार पर ब्रेक लगेगा?
इस हादसे में सिर्फ अनिता यादव नहीं मरी हैं, यहां एक बेटी का भविष्य, एक घर की रौनक और इंसानियत पर भरोसा भी कुचल गया है।
ईश्वर उस बेटी को संबल दें— लेकिन उससे पहले समाज और सिस्टम को शर्म आनी चाहिए, क्योंकि यह मौत नहीं, हमारी लापरवाही का कत्ल है।
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