
उदयपुर। झीलों की नगरी में कथित उदयपुर एप्सटीन फाइल्स के नाम की गूंज अब जयपुर और दिल्ली के गलियारों में साफ सुनाई देने लगी है। हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी किसी बड़े एक्शन की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन पिछले कुछ दिनों में हुए दो बड़े घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि भाजपा आलाकमान अब इस विवाद से पल्ला झाड़ने और संगठन में नई जान फूंकने की तैयारी कर चुका है।
हालांकि इस मामले में क्या कार्रवाई होनी है या नहीं होनी है…इसको लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। लेकिन इसके इफेक्ट दिखाई देने लगे हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की बेणेश्वर यात्रा के दौरान डबोक एयरपोर्ट पर मिलने वालों की सूची से बीजेपी उदयपुर शहर व उदयपुर देहात के अध्यक्षाें के नाम काट दिए गए। पिछले दिनों जांच अधिकारी बदल दिया गया। बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं व पदाधिकारियों की बैठक में नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर मंथन और पैनल में आठ से दस नाम आलाकमान को भेज दिए गए। यह बातें मुखालफत करने वाले देख रहे हैं। उनका मानना है कि अब पार्टी की मीटिंगों में भी महिलाओं की संख्या कम हो गई है। इस बार होली मिलन का भी आयोजन नहीं हुआ। ये छोटी-छोटी बातें कहानी को बड़ा बना रही है।
खिलाफत (समर्थन) करने वालों का नजरिया अलग है। पहला तो अगर कोई वीडियो है तो अब तक सामने क्यों नहीं आया? दूसरा यदि वे दोषी होते तो आलाकमान ने अभी तक उन्हें पद पर क्यों बनाए रखा है? तीसरा आरोपी पक्ष का आत्मविश्वास इतना है कि व पार्टी कार्यालय और उद्घाटनों में बिना कोई शर्म महसूस किए हुए जा रहे हैं।
जैसा कि आपको मालूम है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली यह सार्वजनिक रूप से यह बता चुके हैं कि इसमें परिवादी भी बीजेपी का है और आरोपी भी बीजेपी के हैं। उदयपुर से लेकर दिल्ली तक के लोग इस कहानी में अलग-अलग किरदार के रूप में बताए गए हैं।
सूत्रों के मुताबिक कार्रवाई अब तक इसलिए नहीं हुई कि इस मुद्दे पर ऊपर तक के लोग दो गुटों में बंट गए हैं। एक गुट चाहता है कि पार्टी की छवि बनी रहे इसलिए कार्रवाई बहुत जरूरी है क्योंकि आग लगी है तो कहीं न कहीं चिंगारी तो होगी। एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि कई दिग्गज लोग भी इस केस में केंद्रीय भूमिका में है। जहां तक वीडियो व ऑडियो क्लिपों की बात है चंद प्रमुख नेताओं को दिखाई गई है। लोगों को इनके बाहर आने का इंतजार है। प्रमुख आरोपी के जेल से रिहा होने का भी इंतजार किया जा रहा है।
उधर, मुख्यमंत्री के प्रोटोकॉल से जिलाध्यक्षों का नाम कटना राजनीति में ‘अघोषित निलंबन’ जैसा माना जाता है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक पार्टी नेतृत्व विवादित चेहरों के साथ मंच साझा करने के पक्ष में नहीं है।
सियासी गलियारों में चर्चा है कि पुराने अध्यक्षों की विदाई तय मानकर नए चेहरों की ‘कास्टिंग’ शुरू हो चुकी है ताकि आगामी चुनावों और पार्टी कार्यक्रमों से पहले डैमेज कंट्रोल किया जा सके।
फिलहाल सबकी नजरें दिल्ली की ओर हैं। पैनल में शामिल नामों में से किन चेहरों पर मुहर लगती है, यह उदयपुर की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेगा। वहीं, वर्तमान पदाधिकारियों के प्रोटोकॉल से बाहर होने ने विरोधियों को हमलावर होने का एक बड़ा मौका दे दिया है।
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