
उदयपुर। हाल ही में बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा का अंजुमन में स्वागत किया जाना राजनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह गहरा विश्लेषण मांगता है। भारतीय राजनीति में ‘प्रतीकात्मकता’ (Symbolism) हमेशा से हावी रही है। स्वागत-सत्कार और मंच साझा करना यह तो दर्शाता है कि संवाद के द्वार खुले हैं, लेकिन सवाल यह है कि इस संवाद का हासिल क्या है?
अंजुमन जैसी संस्थाएं कौम की धरोहर हैं। जब यहां से राजनीतिक मंच सजते हैं, तो उम्मीद की जाती है कि वहां व्यक्तिगत प्रशंसा के बजाय सामुदायिक विकास का एजेंडा रखा जाएगा। वर्तमान स्थिति में, राजनीति केवल ‘चुनिंदा चेहरों’ के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिससे आम आदमी और उसके मुद्दे हाशिए पर चले गए हैं।
तथाकथित नेतृत्व और जवाबदेही का अभाव : मंच पर बैठने वाले तथाकथित नेताओं की मंशा और उनकी सक्रियता पर कड़े सवाल उठना लाजिमी है। अक्सर आपने देखा होगा कि बीजेपी का जब भी कोई बड़ा लीडर आता है, ये साहब उनके इर्द-गिर्द दिखाई देते हैं। वैसे ये बिजनेसमेन भी कहलवाते हैं। उन्हें कौम के मुद्दों से कोई सरोकार नहीं है। माइक पर बोलने का मौका मिले तो वे बड़ी-बड़ी बातें करके चले जाते हैं। अब तक जो भी घोषणाएं की, उनका कुछ नहीं हुआ।
बहरहाल यह एक कड़वा सच है कि कई नेता राजनीति को ‘समाज सेवा’ के बजाय ‘स्व-उन्नति’ का जरिया बना चुके हैं। चुनाव के समय किए गए वादे अक्सर कागजी ही रह जाते हैं।
SIR और डेटा की कमी : SIR (Social Impact & Reform) जैसे बड़े मुद्दों पर बात करना आसान है, लेकिन धरातल पर होमवर्क शून्य है। उदयपुर और आसपास के क्षेत्रों में मुस्लिम समाज के वोटों के कटने या जुड़ने का सटीक डेटा न होना, नेतृत्व की घोर लापरवाही को दर्शाता है। यदि आपके पास आंकड़े नहीं हैं, तो आप संवैधानिक लड़ाई कैसे लड़ेंगे?
प्राथमिकताओं का भटकाव: शादियों में फिजूलखर्ची रोकना अच्छी पहल है, लेकिन समाज को खोखला कर रहे ‘नशे के कारोबार’ पर चुप्पी साध लेना दोगलापन है। क्या ये नेता उन लोगों के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत रखते हैं जो समाज के युवाओं को जहर बेच रहे हैं?
युवाओं का रास्ता रोकना : ‘सियासी रोटियां’ सेकने वाले चंद पुराने चेहरे नए और शिक्षित युवाओं को आगे आने से रोक रहे हैं। जब तक राजनीति में नया खून और नई सोच नहीं आएगी, तब तक कौम का नजरिया नहीं बदलेगा।
सुझावात्मक समाधान : ‘बदला’ नहीं ‘बदलाव’ की राह
कौम को अब खोखले नारों से बाहर निकलकर ‘एक्शन प्लान’ पर काम करना होगा।
डेटा-आधारित राजनीति (Data-Driven Leadership) : अंजुमन और स्थानीय नेताओं को एक टेक्निकल टीम बनानी चाहिए जो ड्रॉप-आउट बच्चों और मतदाता सूची का सटीक डेटा तैयार करे। बिना डेटा के सरकार से कोई भी मांग मजबूती से नहीं रखी जा सकती।
शिक्षा की गारंटी : केवल स्कूल जाने की बात काफी नहीं है। ड्रॉप-आउट बच्चों के लिए ‘ब्रिज कोर्स’ और तकनीकी शिक्षा पर जोर देना होगा ताकि वे रोजगार से जुड़ सकें।
नशा मुक्ति और सख्त सामाजिक पाबंदी : नशा करने वालों के साथ-साथ इसका कारोबार करने वालों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। नेताओं को मंच से पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाना चाहिए कि ऐसे अड्डों को ध्वस्त किया जाए।
लोकतांत्रिक भागीदारी का विस्तार : स्वागत समारोहों में केवल गुलदस्ते न दिए जाएं, बल्कि एक ‘डिमांड चार्ट’ (मांग पत्र) सौंपा जाए। अगली बार स्वागत तभी हो, जब पिछली मांगों पर काम हुआ हो।
नौजवानों को नेतृत्व : पढ़े-लिखे युवाओं को समितियों और राजनीतिक फ्रंट पर जगह देनी होगी। बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं का जोश ही सही मायने में ‘बदलाव’ लाएगा।
स्वागत करना तहजीब हो सकती है, लेकिन आत्मसमर्पण नहीं। अंजुमन को ‘सियासी अखाड़ा’ बनने के बजाय ‘हक की आवाज’ बनना होगा। जैसा कि आपने सही कहा, हमें “बदला नहीं, बदलाव” चाहिए। यह बदलाव तब आएगा जब हम नेताओं की चमक-धमक से प्रभावित होना छोड़कर अपने बच्चों के भविष्य और समाज की सुरक्षा पर सवाल करना शुरू करेंगे।
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