
310 रुपए की दिहाड़ी पर दांव पर लगी जिंदगी, सुरक्षा के नाम पर न हेलमेट मिला और न ही सेफ्टी जैकेट
सवा साल की मासूम को मां के आंचल का इंतजार, 6 साल का बेटा बोला- “मम्मी अस्पताल से आकर मेरे साथ खेलेंगी”
जयपुर। राजधानी जयपुर के पॉश इलाके वैशाली नगर (गांधी पथ वेस्ट) में गुरुवार को एक बेहद दर्दनाक और रूह कपा देने वाला हादसा सामने आया। यहाँ एक निर्माणाधीन बहुमंजिला इमारत के बेसमेंट में काम करने के दौरान अचानक मिट्टी का एक बड़ा हिस्सा ढह गया। इस मलबे में दबने से बिहार की रहने वाली तीन महिला मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई। इस भीषण हादसे ने न सिर्फ तीन हंसते-खेलते परिवारों के चिराग बुझा दिए, बल्कि चार मासूम बच्चों के सिर से हमेशा-हमेशा के लिए मां का साया और ममता छीन ली।
हादसे के बाद निर्माण स्थल पर चीख-पुकार और अफरा-तफरी मच गई। साथी मजदूरों ने अपनी जान जोखिम में डालकर मिट्टी को हटाकर तीनों महिलाओं को बेसुध हालत में बाहर निकाला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने तीनों को मृत घोषित कर दिया।
“दोपहर में साथ खाना खाया था, फिर अचानक मौत की आवाज आई”
मृतक महिलाओं के साथ काम करने वाली चश्मदीद मजदूर सीमा देवी ने रोते हुए इस भयानक मंजर की दास्तां बयां की। सीमा ने बताया:
“दोपहर में हम सबने एक साथ बैठकर खाना खाया था और हंसी-मजाक किया था। किसी को अंदाजा नहीं था कि मौत कुछ ही मिनटों की दूरी पर खड़ी है। काम पर लौटते ही अचानक एक ज़ोरदार आवाज़ हुई। हम भागकर पहुंचे तो देखा कि भारी मात्रा में मिट्टी ढह चुकी थी और सुनीता, अनुति व प्रतिमा उसके नीचे दबी थीं।”
310 रुपए की दिहाड़ी, पर सुरक्षा के नाम पर ‘शून्य’
सीमा देवी की आवाज़ में ठेकेदार और सिस्टम के खिलाफ भारी दर्द और आक्रोश साफ झलका। उन्होंने आरोप लगाया कि ठेकेदार हमें बिहार से यहाँ मजदूरी के लिए लेकर आया था। हमें रोज़ाना सिर्फ 310 रुपए की दिहाड़ी मिलती है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर यहाँ कुछ भी नहीं है। मजदूरों को न तो हेलमेट दिए गए थे, न सेफ्टी जैकेट और न ही ढहती मिट्टी को रोकने के लिए कोई पुख्ता सपोर्ट लगाया गया था। अगर सुरक्षा मानकों का थोड़ा भी ध्यान रखा जाता, तो आज तीन जानें बच सकती थीं।
दर्द का सबसे स्याह पहलू: मासूम बच्चों की टकटकी
इस हादसे का सबसे मार्मिक और झकझोर देने वाला पहलू उन मासूम बच्चों की आंखों में तैर रहा है, जिन्हें यह भी नहीं पता कि ‘मौत’ क्या होती है:
सवा साल की बच्ची का रो-रोकर बुरा हाल: मृतका प्रतिमा कुमारी की सवा साल की दुधमुंही बेटी लगातार अपनी मां को ढूंढ रही है। भूख लगने पर वह रो पड़ती है और बार-बार टकटकी लगाए दरवाजे की तरफ देखती है कि अभी मां आएगी और उसे सीने से लगा लेगी। बस्ती की अन्य महिलाएं उसे चुप कराने की नाकाम कोशिश कर रही हैं।
6 साल के प्रिंस का मासूम इंतजार: मृतका सुनीता देवी के 6 वर्षीय बेटे प्रिंस को अभी मां की मौत की सच्चाई नहीं बताई गई है। प्रिंस ने मासूमियत से कहा— “मम्मी मिट्टी में दब गई थीं, पापा उन्हें अस्पताल ले गए हैं। मेरी मम्मी मुझसे बहुत प्यार करती हैं। वह जल्दी वापस आ जाएंगी और फिर मेरे साथ खेलेंगी।” वहीं उसकी 4 साल की छोटी बहन पिंकी मां को याद कर लगातार सिसक रही है।
मजदूरों में भारी आक्रोश, ठेकेदार पर लापरवाही के गंभीर आरोप
इस दर्दनाक हादसे के बाद एसएमएस अस्पताल और मजदूर बस्ती में मातम के साथ-साथ भारी तनाव का माहौल है। स्थानीय और साथी मजदूरों का कहना है कि बेसमेंट की खुदाई जैसे अत्यधिक जोखिम भरे काम में बिना सुरक्षा मानकों के काम करवाना एक सोची-समझी लापरवाही है। मजदूरों ने आरोप लगाया कि बिल्डर और ठेकेदार ने मोटी कमाई के चक्कर में इन गरीब जिंदगियों को मौत के मुंह में धकेल दिया। पीड़ित परिवारों ने ठेकेदार के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई और उचित मुआवजे की मांग की है।
तीन मौतें और सिस्टम पर खड़े होते तीखे सवाल
गांधी पथ वेस्ट का यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि जयपुर में धड़ल्ले से चल रहे अवैध और असुरक्षित निर्माण कार्यों पर एक बड़ा सवालिया निशान है:
बिना किसी सुरक्षा उपकरण और सिविल इंजीनियर की देखरेख के इतनी गहरी खुदाई क्यों की जा रही थी?
श्रम विभाग और नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारी इन निर्माण स्थलों का निरीक्षण क्यों नहीं करते?
क्या चंद रुपयों की दिहाड़ी पर गरीब मजदूरों की जान इतनी सस्ती है कि उनकी सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी जाए?
फिलहाल पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और शवों का पोस्टमार्टम करवाया जा रहा है। लेकिन इन कानूनी प्रक्रियाओं के बीच, उन मासूम बच्चों का बचपन हमेशा के लिए सूना हो गया है, जिनकी दुनिया उनकी मां की गोद में सिमटी हुई थी।
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