
ग्लासगो का खेल का मैदान… चारों तरफ तालियों की गड़गड़ाहट और बीच में हवा में लहराता हमारा प्यारा तिरंगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राष्ट्रमंडल खेल 2026 में जूडो में मिली इस स्वर्णिम चमक के पीछे कितना अंधेरा, कितनी रातें बिना सोए और कितने आंसू छिपे हैं?
भारत ने जूडो में 36 सालों का सूखा खत्म कर एक ही दिन में 2 गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा है। यह जीत केवल किसी खेल की जीत नहीं, बल्कि गरीबी और तकदीर के थपेड़ों पर मेहनत के करारे थप्पड़ की जीत है।
1. अस्मिता डे — पिता की पंचर की दुकान, न जूते थे न किट… फिर आया पिता के जाने का वो काला दिन
अस्मिता जब मैट पर उतरकर अपने प्रतिद्वंद्वी को पटकनी दे रही थीं, तो उनके दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही होगी— “पापा, देखिए आपका सपना पूरा हो गया!”
अस्मिता के पिता अर्जुन डे की एक छोटी सी पंचर बनाने की दुकान थी। उसी मामूली सी कमाई से घर का चूल्हा जलता था। कई बार तो ऐसी नौबत आई कि अस्मिता के पास न प्रैक्टिस के लिए अच्छे जूते थे और न ही जूडो की किट। लेकिन बिटिया के सपनों की खातिर पिता रोज पसीना बहाते रहे।
2018 में जब अस्मिता का चयन भोपाल के साई (SAI) सेंटर में हुआ, तो स्कॉलरशिप के जो पैसे मिले, उसमें से बड़ा हिस्सा वह खुद पेट काटकर अपने घर भेजने लगीं ताकि पिता का हाथ बंट सके।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। राष्ट्रमंडल खेलों की कड़ी तैयारियों के बीच दिसंबर 2025 में ब्रेन स्ट्रोक से पिता का साया हमेशा के लिए सिर से उठ गया। दुनिया उजड़ चुकी थी, आंखें आंसुओं से भरी थीं। तब भाई ने आंसुओं को पोंछते हुए हिम्मत बंधाई और कहा— “अब पापा का सपना तुम्हें ही पूरा करना है।”
अस्मिता ने पिता को खोने के दर्द को अपनी ताकत बनाया, और आज ग्लासगो में 48 किग्रा वर्ग में गोल्ड जीतकर पिता को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि दे दी।
2. हर्ष सिंह — किसान का वो बेटा जिसने तंगी को जूते के नीचे रौंदकर जीता गोल्ड
पंजाब के बठिंडा के एक छोटे से किसान परिवार में जन्मे हर्ष सिंह के लिए खेल का सफर कांटों भरा था। खेत में पिता का पसीना और घर में छाई आर्थिक तंगी देख हर्ष का दिल रोता था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
अपनी तंगी को दूर करने और खेल को जिंदा रखने के लिए उन्होंने 2021-22 में भारतीय सेना जॉइन की। सेना के कड़े अनुशासन और ट्रेनिंग ने उनके सपनों को नए पंख दिए। वर्तमान में हवलदार के पद पर तैनात हर्ष जब पुरुषों के 60 किग्रा वर्ग में गोल्ड मेडल जीतने के बाद अपने मां-बाप को याद कर रहे थे, तो उनकी आंखें छलक आईं।
हर्ष ने रूंधे गले से कहा:
“मैं यह गोल्ड मेडल अपनी मां और पिता जी को समर्पित करता हूं, जिन्होंने तंगी के बावजूद मुझे कभी टूटने नहीं दिया। अब मेरा अगला लक्ष्य एशियन गेम्स और ओलंपिक में तिरंगा लहराना है।”
एक दिन, अनगिनत उम्मीदें और भारत का सीना चौड़ा
यह दिन सिर्फ अस्मिता और हर्ष का नहीं था, यह दिन हर उस मां का था जिसने तंगी में अपने बच्चों के सपने सींचे।
नीरज चोपड़ा और यशवीर: जैवलिन थ्रो में नीरज ने सिल्वर और यशवीर ने ब्रॉन्ज जीतकर साबित किया कि भारत की भाले की नोक अब कभी ढीली नहीं पड़ेगी।
यामिनी मौर्या: जूडो में ही सिल्वर जीतकर देश का मान बढ़ाया।
तेजस्विन शंकर: डेकाथलों में देश को पहला मेडल (ब्रॉन्ज) दिलाकर इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज कराया।
बॉक्सिंग का तूफान: अंकुश, प्रीति, जैस्मिन और अरुंधति सहित 10 मुक्केबाजों ने फाइनल में पहुंचकर 10 सिल्वर पक्के कर दिए हैं और अब गोल्ड पर दांव लगाने को तैयार हैं।
आज जब ये खिलाड़ी पोडियम पर खड़े होकर राष्ट्रगान गा रहे थे, तब उनके गालों पर लुढ़के आंसुओं में उनके मां-बाप के त्याग और भारत माता के प्रति उनके समर्पण की कहानी साफ पढ़ी जा सकती थी।
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