उदयपुर की झीलों को बचाने के लिए राजस्थान हाई कोर्ट सख्त : प्रदूषण और अतिक्रमण की खबरों पर कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान

अंधाधुंध शहरीकरण, सीवेज और प्राकृतिक जल प्रवाह (ड्रेनेज) को रोकने पर हाई कोर्ट ने जताई कड़ी चिंता

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए न्यायालय ने जल निकायों के संरक्षण के लिए उठाए कड़े कदम

जोधपुर/उदयपुर। झीलों की नगरी (लेक सिटी) के नाम से विश्व प्रसिद्ध उदयपुर की लाइफलाइन कही जाने वाली झीलों, नहरों और अन्य जल निकायों (Water Bodies) के अस्तित्व पर मंडराते संकट को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। शहर में बढ़ रहे प्रदूषण, असीमित अतिक्रमण और बुनियादी ढांचे की अनदेखी से जुड़ी विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले पर स्वतः संज्ञान (Suo-Motu Cognizance) लिया है।

हाई कोर्ट ने जताई गहरी चिंता, इन गंभीर मुद्दों को बनाया आधार

न्यायालय ने उदयपुर और उसके आस-पास के जल स्रोतों की बदहाली को लेकर चिंता व्यक्त की है। हाई कोर्ट द्वारा संज्ञान में लिए गए मुख्य विषय निम्नलिखित हैं:

अंधाधुंध शहरीकरण और अतिक्रमण: झीलों और कैचमेंट एरिया के आस-पास तेजी से बढ़ रहा कंक्रीट का जाल (शहरीकरण) और पानी के रास्तों पर अवैध कब्जे।

सीवेज और गंदगी का बहाव: झीलों में सीधे गिर रहा गंदा पानी (सीवेज डिस्चार्ज) और ठोस कचरा, जिससे पानी की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है।

प्राकृतिक बहाव से छेड़छाड़: पानी की आवक वाले प्राकृतिक रास्तों (Natural Drainage Channels) को बंद करना या उनके स्वरूप को बदलना, जिससे मानसून के समय बाढ़ का खतरा और सूखे के समय झीलों के सूखने की नौबत आती है।

बुनियादी ढांचे की अनदेखी: जल अवसंरचना (Water Infrastructure) का सही समय पर रखरखाव और जीर्णोद्धार न होना।

सिस्टम और प्रशासन की जवाबदेही होगी तय

विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट के इस कड़े कदम के बाद अब जिला प्रशासन, नगर निगम, यूआईटी (UIT) और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी स्थानीय सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही तय होगी। कोर्ट इस मामले में जल्द ही राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर उदयपुर की झीलों के संरक्षण के लिए अब तक किए गए कार्यों और भविष्य के एक्शन प्लान पर विस्तृत रिपोर्ट तलब कर सकता है।

उदयपुर के पर्यावरण प्रेमियों में जगी नई आस

लंबे समय से झीलों को बचाने की मुहिम में जुटे उदयपुर के स्थानीय पर्यावरणविदों और नागरिकों ने माननीय राजस्थान हाई कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि पर्यटन और पर्यावरण दोनों के लिहाज से उदयपुर की झीलें सबसे अमूल्य धरोहर हैं, लेकिन भू-माफियाओं और प्रशासनिक ढिलाई के चलते इन्हें भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा था। अब कोर्ट के दखल के बाद उम्मीद है कि झीलों को अतिक्रमण और प्रदूषण से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सकेगी।

 

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