
उदयपुर। सियासत के मंच पर कब कौन सा सीन सुपरहीट हो जाए और उसकी गूंज कहां तक सुनाई दे, यह कहना मुश्किल है। मंगलवार को असम की राजधानी गुवाहाटी में जब डॉ. हिमंता बिस्वा सरमा लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, तब उस महामंच की ‘पॉलिटिकल वाइब्स’ ने हजारों किलोमीटर दूर मेवाड़ यानी उदयपुर की धड़कनों को अचानक थाम दिया।
वजह कोई असम का सियासी समीकरण नहीं था, बल्कि मंच पर हुआ एक ऐसा ‘पावर मोमेंट’ था जिसके तार सीधे झीलों की नगरी से जुड़े थे। यह मौका था—देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मेवाड़ के कद्दावर नेता व पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के बीच हुई एक बेहद खास और आत्मीय मुलाकात का।
जब 22 मुख्यमंत्रियों की भीड़ में रुक गए कदम
समारोह का तामझाम ऐतिहासिक था। मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत एनडीए शासित 22 राज्यों के मुख्यमंत्रियों का जमघट लगा था। प्रोटोकॉल और अभिवादन का सिलसिला चल रहा था। इसी दौरान जैसे ही पीएम मोदी की नजर पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया पर पड़ी, प्रधानमंत्री के कदम ठिठक गए।
पीएम मोदी ने न सिर्फ कटारिया का गर्मजोशी से अभिवादन स्वीकार किया, बल्कि भारी भीड़ और व्यस्तता के बावजूद उनसे रुककर कुछ क्षण खास बातचीत भी की। दोनों नेताओं के बीच की यह आत्मीयता कैमरों में कैद हो गई और चंद लम्हों में यह रील असम के खानापारा मैदान से उड़कर सीधे उदयपुर के सोशल मीडिया के गलियारों में लैंड कर गई।
उदयपुर में क्यों मच गया तहलका? जानिए अंदरूनी वजह
जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, उदयपुर की राजनीति में ‘भूचाल’ आ गया। कटारिया समर्थकों ने इस रील को ताबड़तोड़ शेयर करते हुए कैप्शन लिखने शुरू कर दिए— “मेवाड़ के शेर का राजनीतिक वजूद आज भी दिल्ली के दिल में कायम है।” दरअसल, उदयपुर में इस वीडियो के वायरल होने के पीछे एक बहुत बड़ी अंदरूनी और सियासी वजह है:
‘मेन स्ट्रीम’ से बाहर मानने वालों को जवाब : जब से गुलाबचंद कटारिया को राजस्थान की सक्रिय राजनीति से मान-सम्मान के साथ राजभवन (पहले असम और अब पंजाब) भेजा गया है, तब से उनके विरोधी गुट ने यह मान लिया था कि कटारिया अब मुख्यधारा की राजनीति से पूरी तरह ‘आउट’ हो चुके हैं। लेकिन पीएम मोदी के इस स्पेशल जेस्चर ने विरोधियों के दावों की हवा निकाल दी।
गुटबाजी और ‘उदयपुर फाइल्स’ का कनेक्शन : उदयपुर भाजपा में इस वक्त अंदरूनी खींचतान चरम पर है। हाल ही में सामने आए कथित वीडियोकांड ‘उदयपुर फाइल्स’ को लेकर जो गुटबाजी उभरी है, उसमें एक धड़ा पूरी तरह से कटारिया का वफादार और कट्टर समर्थक माना जाता है। विरोधी गुट लगातार कटारिया के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है और यहां तक कि राष्ट्रपति तक को शिकायतें भेजी जा रही हैं। ऐसे माहौल में इस वीडियो ने कटारिया समर्थकों को विरोधियों के सामने ‘कॉन्फिडेंस’ से कॉलर ऊंची करने का बड़ा मौका दे दिया है।
“बुलावा आया था, इसलिए गया…” — कटारिया की सादगी
इस पूरे सियासी बवंडर और वायरल वीडियो पर जब पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया से बात की गई, तो उन्होंने बेहद सधे और मर्यादित अंदाज में संवैधानिक गरिमा बनाए रखी। कटारिया ने कहा : “मैं पंजाब का राज्यपाल बनने से पहले असम का राज्यपाल रहा हूं। उस दौरान असम की जनता और वहां के नेताओं से मेरा एक बेहद आत्मीय और व्यक्तिगत रिश्ता बन गया था। चूंकि हिमंता बाबू के शपथ ग्रहण का भव्य आयोजन था और मुझे वहां से विशेष आमंत्रण मिला था, इसलिए मैं इस गरिमामयी समारोह में शामिल होने गुवाहाटी गया था।”
खैर, कटारिया इसे भले ही एक शिष्टाचार भेंट और व्यक्तिगत रिश्ता बता रहे हों, लेकिन उदयपुर की ‘पॉलिटिकल थिएटर’ में इस एक सीन ने यह तो साफ कर दिया है कि मेवाड़ की सियासत की ‘स्क्रिप्ट’ आज भी गुलाबचंद कटारिया के रसूख के बिना अधूरी है!
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