
नई दिल्ली/सीकर।
भारत की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन मानी जाने वाली चिकित्सा प्रवेश परीक्षा ‘नीट-यूजी 2026’ का रद्द होना केवल एक परीक्षा का निरस्त होना नहीं है, बल्कि देश के 23 लाख छात्रों और उनके परिवारों के भरोसे का कत्ल है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने 3 मई को हुई परीक्षा को भले ही ‘पारदर्शिता’ के नाम पर रद्द कर दिया हो, लेकिन यह फैसला उन लाखों आंखों में आंसू छोड़ गया है जिन्होंने सालों तक एक कमरे में बंद होकर डॉक्टर बनने का सपना बुना था।
क्या NTA केवल एक ‘रबर स्टैम्प’ संस्था बनकर रह गई है?
आलोचना के घेरे में सबसे पहले वह सिस्टम है जो हर साल सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करता है। 2024 के कलंक के बाद उम्मीद थी कि 2026 में अभेद्य किलेबंदी होगी, लेकिन राजस्थान के सीकर से निकला एक ‘हस्तलिखित गेस पेपर’ पूरी व्यवस्था के गाल पर तमाचा है।
सवाल यह है कि जब 8 मई को ही गड़बड़ी की भनक लग गई थी, तो फैसला लेने में 12 मई तक का इंतजार क्यों किया गया?
गंभीर चूक : 720 में से 600 नंबर के सवाल हूबहू मिल जाना कोई ‘संयोग’ नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर बैठी ‘दीमकों’ की सोची-समझी साजिश है। केरल से एमबीबीएस कर रहा एक छात्र अगर पेपर लीक करने की हिम्मत जुटा पा रहा है, तो समझ लीजिए कि ‘किंगपिन’ कितने गहरे जमे होंगे।
कलम की ताकत पर भारी पड़ा ‘कागज का टुकड़ा’
इस खबर ने उन छात्रों को तोड़ कर रख दिया है जो परीक्षा देकर यह मान चुके थे कि उनकी मेहनत सफल हुई।
छात्रों का दर्द : एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए नीट की तैयारी केवल पढ़ाई नहीं, एक बड़ा निवेश है—समय का, भावनाओं का और मेहनत की कमाई का।
असमंजस : “क्या दोबारा परीक्षा में वही प्रदर्शन हो पाएगा?” “क्या अगली बार पेपर लीक नहीं होगा?” ये सवाल आज हर छात्र के मन में घर कर गए हैं। फीस वापस करना एक मरहम हो सकता है, लेकिन उस मानसिक प्रताड़ना का क्या, जो ये 23 लाख छात्र अगले री-एग्जाम तक झेलेंगे?
सीबीआई जांच और भविष्य की डगर
जांच अब सीबीआई (CBI) के हाथों में है, जो एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन यह ‘मर्ज’ के इलाज से ज्यादा ‘पोस्टमार्टम’ जैसा नजर आता है।
सीकर का गढ़ : सीकर, झुंझुनू और देहरादून से हुई गिरफ्तारियां बताती हैं कि कोचिंग हब अब ‘शिक्षा के मंदिर’ के बजाय ‘सेटिंग के बाजार’ बनते जा रहे हैं।
री-एग्जाम की चुनौती : दोबारा परीक्षा आयोजित करना NTA के लिए साख बचाने की आखिरी कोशिश होगी। रजिस्ट्रेशन न कराना और पुराने सेंटर रखना प्रशासनिक दृष्टि से सही है, लेकिन छात्रों का ‘कॉन्फिडेंस’ वापस लाना नामुमकिन के बराबर है।
सुधार या सिर्फ खानापूर्ति?
2024 में सुप्रीम कोर्ट ने पूरी परीक्षा रद्द नहीं की थी, लेकिन 2026 में साक्ष्यों के भारी बोझ ने सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। यदि अब भी ‘पेपर लीक माफिया’ की जड़ें नहीं खोदी गईं, तो हर साल लाखों युवा अपनी योग्यता के बजाय व्यवस्था की सड़ांध से हारते रहेंगे।
सीबीआई की जांच और री-एग्जाम की तारीखें भले ही आ जाएं, पर सवाल वही खड़ा है— क्या भारत के भविष्य को सुरक्षित रखने वाली तिजोरियां इतनी कमजोर हैं कि एक वॉट्सऐप मैसेज उन्हें तोड़ देता है?
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