
शिमला। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर ज़िले में 200 मीटर गहरी खाई में बस गिरने की घटना एक बार फिर पहाड़ी इलाकों में सड़क सुरक्षा और परिवहन व्यवस्था की गंभीर कमज़ोरियों को उजागर करती है। इस हादसे में 14 लोगों की मौत और 52 के घायल होने से स्पष्ट है कि यह सिर्फ़ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्थागत लापरवाही का परिणाम भी हो सकता है।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार बस के स्किड होने और कोहरे की भूमिका सामने आ रही है, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि 39 सीटर बस में 66 यात्रियों का सवार होना कैसे संभव हुआ। यह ओवरलोडिंग न केवल मोटर वाहन नियमों का उल्लंघन है, बल्कि पहाड़ी सड़कों पर यात्रियों की जान के साथ सीधा खिलवाड़ भी है। ऐसे मामलों में चालक, बस मालिक और परिवहन विभाग—तीनों की जवाबदेही तय होना ज़रूरी है।
हादसे के बाद स्थानीय लोगों द्वारा तुरंत राहत और बचाव कार्य शुरू किया जाना सकारात्मक पहलू रहा। इससे यह साबित होता है कि आपदा के समय स्थानीय समुदाय सबसे पहली और अहम कड़ी बनता है। हालांकि, दुर्गम इलाकों में गंभीर घायलों को शिमला जैसे बड़े अस्पतालों तक पहुंचाने में लगने वाला समय यह दर्शाता है कि ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में आपात चिकित्सा ढांचे को और मज़बूत करने की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री द्वारा मृतकों और घायलों के लिए आर्थिक सहायता (एक्स ग्रेशिया) की घोषणा पीड़ित परिवारों को तत्काल राहत देने का प्रयास है, लेकिन यह सहायता स्थायी समाधान नहीं है। बार-बार होने वाले ऐसे हादसे यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या केवल मुआवज़े की घोषणा ही पर्याप्त है, या फिर सड़क सुरक्षा, वाहन फिटनेस जांच, ड्राइवर ट्रेनिंग और मौसम के हिसाब से यातायात नियंत्रण जैसी नीतियों को सख्ती से लागू करने की ज़रूरत है।
पोश त्योहार के कारण बड़ी संख्या में लोगों का गांव लौटना बताता है कि पर्व-त्योहारों के समय पहाड़ी क्षेत्रों में यात्री दबाव बढ़ जाता है। ऐसे समय में प्रशासन द्वारा विशेष निगरानी और अतिरिक्त सुरक्षा उपाय न करना भी एक बड़ी चूक मानी जा सकती है।
कुल मिलाकर, सिरमौर बस हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि ओवरलोडिंग, कमजोर निगरानी, मौसम की अनदेखी और आपात व्यवस्थाओं की सीमाओं का संयुक्त परिणाम प्रतीत होता है। जब तक इन मूल कारणों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक ऐसे हादसे दोहराते रहेंगे।
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