उम्मीदों का नया सवेरा : दिल्ली में जब 21 दिव्यांग जोड़ों ने थामा एक-दूसरे का दामन

नई दिल्ली। जीवन की राहें जब शारीरिक और आर्थिक चुनौतियों की वजह से पथरीली हो जाती हैं, तो अक्सर सपने धुंधले पड़ने लगते हैं। लेकिन जब समाज की संवेदनशीलता और अपनों का साथ मिलता है, तो उन्हीं पथरीली राहों पर उम्मीदों के फूल खिल उठते हैं। कुछ ऐसा ही भावुक और दिल को छू लेने वाला नजारा नई दिल्ली के रोहिणी स्थित गोल्डन स्टार बैंक्वेट में देखने को मिला, जहाँ नारायण सेवा संस्थान, उदयपुर के तत्वावधान में 21 दिव्यांग और निर्धन जोड़े अपने जीवन के सबसे खूबसूरत और नए अध्याय की दहलीज पर खड़े नजर आए।

पिछले चार दशकों से बेसहारा और जरूरतमंद चेहरों पर मुस्कान बिखेर रहे इस संस्थान के 46वें नि:शुल्क सामूहिक विवाह समारोह का आगाज़ शनिवार को हुआ। यह केवल एक पारंपरिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह उत्सव था—संघर्षों पर हौसले की जीत का, तिरस्कार पर सम्मान की जीत का।

हल्दी और मेहंदी के रंगों में घुलीं बरसों की दुआएं

शनिवार की शाम जैसे ही घड़ी ने 5:30 बजाए, वैदिक मंत्रों की गूंज के साथ विघ्नहर्ता भगवान गणपति की स्थापना की गई। इसके साथ ही शुरू हुआ हल्दी और मेहंदी का वो सगुन, जिसका इंतजार इन जोड़ों और उनके परिवारों को बरसों से था।

खुशी के आंसू और भीगी पलकें: जब अपनों ने दूल्हा-दुल्हनों के हाथों में मेहंदी रचाई और गालों पर हल्दी का उबटन लगाया, तो माहौल में भावनाओं का एक ऐसा समंदर उमड़ पड़ा जिसे शब्दों में बांधना मुमकिन नहीं था। जो आँखें कभी अपने बच्चों के भविष्य की चिंता में रोया करती थीं, आज उन्हीं माता-पिता की आँखों से संतोष और परम आनंद के आंसू छलक रहे थे।

स्वाभिमान की चमक: हर दुल्हन की मुस्कान में एक नया विश्वास था और हर दूल्हे की आँखों में समाज द्वारा स्वीकार किए जाने का गौरव। बरसों के सामाजिक ताने और हीनभावना को पीछे छोड़कर, ये 21 जोड़े अब एक-दूसरे के हमसफर बनने के लिए तैयार थे।

गूंजते लोकगीत: देश के कोने-कोने से आए परिजनों और संस्थान के साधकों ने जब पारंपरिक विवाह गीतों पर घूमर और लोकनृत्य किया, तो ऐसा लगा मानो पूरा ब्रह्मांड इन मासूम और सच्चे दिलों के मिलन पर झूम रहा हो।

सांस्कृतिक संध्या: अध्यात्म और खुशियों का अनूठा संगम

रात ढलने के साथ ही यह समारोह एक आध्यात्मिक उत्सव में तब्दील हो गया। महिला संगीत के मंच पर जब राधा-कृष्ण रास, रुद्रावतार हनुमान, मां दुर्गा के नवस्वरूप और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की लीलाओं पर आधारित नृत्य-नाटिकाएं प्रस्तुत की गईं, तो वहां मौजूद सैकड़ों अतिथियों की आंखें सजल हो उठीं। देर रात तक गूंजते मंगल गीतों ने हवाओं में भी खुशियों की एक अजीब सी महक घोल दी थी।

समारोह में आए उन भामाशाहों और मददगारों का भी संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल, निदेशक वंदना अग्रवाल एवं देवेंद्र चौबीसा ने पगड़ी और उपरना पहनाकर सम्मान किया, जिनकी बदौलत इन बच्चों के सपने सच हो रहे थे।

यह केवल विवाह नहीं, समानता और समरसता की मिसाल है

रविवार की सुबह 10:15 बजे एक ऐसा पावन क्षण होगा, जब ये 21 जोड़े पवित्र अग्नि के फेरे लेकर सात जन्मों के बंधन में बंध जाएंगे। नारायण सेवा संस्थान की ओर से इन नवदंपतियों को केवल आशीर्वाद ही नहीं, बल्कि एक नया घर बसाने के लिए जरूरत की हर छोटी-बड़ी सामग्री उपहार स्वरूप दी जा रही है।

“सामूहिक विवाह केवल दो इंसानों या दो परिवारों का मिलन भर नहीं है। यह समाज में समरसता, समानता और सबसे बढ़कर मानवता के मूल्यों को सींचने का प्रयास है। यह आयोजन उन परिवारों के लिए उम्मीद की वो खिड़की है, जो गरीबी या शारीरिक अक्षमता के कारण अपने बच्चों के हाथ पीले करने का हौसला नहीं जुटा पाते। हमारा लक्ष्य इन्हें सिर्फ एक परिवार देना नहीं, बल्कि समाज में सिर उठाकर जीने का आत्मसम्मान देना है।” — प्रशांत अग्रवाल (अध्यक्ष, नारायण सेवा संस्थान)

आज जब ये जोड़े एक-दूसरे का हाथ थामकर अपने नए जीवन की ओर कदम बढ़ाएंगे, तो दुनिया यह देखेगी कि कमियां शरीर में हो सकती हैं, आत्मा और हौसलों में नहीं। इन 21 दिव्यांग जोड़ों का यह सफर समाज के लिए एक खूबसूरत संदेश है कि अगर दिल में प्रेम और समाज में संवेदना हो, तो हर जिंदगी को मुकम्मल बनाया जा सकता है।

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