जम्मू में अगस्त 2025 के आख़िरी सप्ताह में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने एक बार फिर प्रशासन और स्थानीय आबादी को कठिन परीक्षा में डाल दिया। बाढ़ और जलभराव के कारण हालात इतने बिगड़ गए कि हज़ारों लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थलों पर शरण लेनी पड़ी। जिला प्रशासन, सेना, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ ने मिलकर समय पर बड़ा बचाव अभियान चलाया और 3,500 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाल लिया। इस संकट ने न केवल जम्मू की संवेदनशील भौगोलिक स्थिति को उजागर किया, बल्कि आपदा प्रबंधन तंत्र की ताक़त और सीमाओं को भी सामने रखा।
बाढ़ का परिदृश्य: संवेदनशील भूगोल और बदलता मौसम
जम्मू और उसके आसपास का इलाक़ा भौगोलिक दृष्टि से बाढ़ के लिए संवेदनशील माना जाता है। तवी और चिनाब जैसी नदियों के किनारे बसे कई गाँव हर मानसून में पानी बढ़ने का ख़तरा झेलते हैं। इस बार भारी वर्षा ने हालात और गंभीर बना दिए।
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आरएस पुरा, परगवाल, खौर और नगरोटा जैसे क्षेत्रों में जलभराव सबसे ज़्यादा रहा।
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कई निचले इलाक़ों में अचानक पानी भर जाने से लोग अपने घरों में फँस गए।
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खेतों और सड़कों पर पानी भरने से न सिर्फ़ यातायात बाधित हुआ, बल्कि कृषि नुकसान का भी अंदेशा बढ़ गया।
मौसम विभाग का कहना है कि इस तरह की अत्यधिक बारिश जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का हिस्सा है, जिससे उत्तर भारत के कई क्षेत्र अब असामान्य रूप से अधिक वर्षा झेल रहे हैं।
बचाव अभियान: प्रशासन और सेना का तालमेल
इस संकट की घड़ी में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने तुरंत आपदा प्रबंधन बलों को सक्रिय किया।
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एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमों ने नावों और बचाव उपकरणों की मदद से घरों में फँसे लोगों को निकाला।
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भारतीय सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मिलकर राहत और निकासी अभियान को तेज़ किया।
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स्थानीय स्वयंसेवकों ने बुज़ुर्गों, महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित निकालने में अहम भूमिका निभाई।
बचाव अभियान की विशेषता यह रही कि समन्वय बेहतरीन रहा। हर एजेंसी ने अपने संसाधन साझा किए और अलग-अलग इलाक़ों में टीमों को तैनात किया गया।
प्रभावित इलाक़े और राहत व्यवस्था
राहत कार्य केवल लोगों को निकालने तक सीमित नहीं रहा। प्रशासन ने उन्हें अस्थायी आश्रय, भोजन और चिकित्सा सुविधाएँ भी उपलब्ध कराईं। कुछ उदाहरण—
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आरएस पुरा: 85 लोगों को सुरक्षित निकाला गया।
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परगवाल (हमीरपुर कोना और गुजराल): 347 लोग अखनूर और जम्मू में पुनर्स्थापित।
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नई बस्ती और लोअर मुठी: 160 लोगों को कैलाश रिसॉर्ट्स में ठहराया गया, जहाँ लंगर की व्यवस्था भी की गई।
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नगरोटा: 100 लोगों को कोंडोली मंदिर में शरण दी गई।
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सुचेतगढ़: मकान ढहने के बाद 15 लोगों को सुरक्षित निकाला गया।
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सतवारी: 300 से अधिक लोगों को एचएसएस सतवारी में रखा गया और सामुदायिक रसोई शुरू की गई।
इन सबके अलावा मुथी और सतवारी में सामुदायिक रसोइयाँ संचालित हो रही हैं। युवाओं से लेकर स्वास्थ्यकर्मियों तक हर स्तर पर लोग मिलकर सहयोग कर रहे हैं।
मानवीय तस्वीर: विस्थापन और चुनौतियाँ
प्रशासन की कोशिशों के बावजूद प्रभावित परिवारों को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
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घर छोड़कर अस्थायी शिविरों में रहना, बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए बेहद कठिन है।
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पानी और गंदगी से बीमारियों का ख़तरा बढ़ गया है।
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रोज़मर्रा की ज़िंदगी—बिजली, पानी और संचार सेवाएँ—ठप हो जाने से लोगों में अनिश्चितता बनी हुई है।
जौरियां के राहत शिविर में रहने वाली एक महिला ने कहा—
“हमने ज़िंदगी में ऐसा मंजर कभी नहीं देखा। बच्चे डरे हुए हैं। प्रशासन ने हमें खाने-पीने की चीज़ें दी हैं, लेकिन अपने घर से दूर रहना बेहद मुश्किल है।”
ऐसे बयान इस संकट की मानवीय पीड़ा को सामने लाते हैं।
प्रशासन की भूमिका और चुनौतियाँ
उपायुक्त डॉ. राकेश मिन्हास ने खुद राहत शिविरों का दौरा किया और लोगों को आश्वासन दिया कि कोई भी परिवार असहाय नहीं छोड़ा जाएगा।
उन्होंने कहा कि प्रशासन की प्राथमिकता—
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प्रभावित लोगों की सुरक्षा।
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अस्थायी आश्रयों में भोजन, पानी और चिकित्सा।
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सड़कों और संचार नेटवर्क की बहाली।
हालाँकि, चुनौतियाँ भी उतनी ही बड़ी हैं—
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लगातार बारिश से राहत कार्यों में बाधा आती रही।
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मलबा और गिरे पेड़ राजमार्गों को बार-बार बंद कर देते हैं।
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सीमावर्ती क्षेत्रों में पहुँचना कठिन रहा।
आपदा प्रबंधन के सबक
जम्मू की यह बाढ़ एक बार फिर दिखाती है कि भारत में आपदा प्रबंधन तंत्र को और मज़बूत करने की ज़रूरत है।
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पहले से चेतावनी देने वाले तंत्र (Early Warning Systems) की पहुँच सीमित है।
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ग्रामीण इलाक़ों में निचले घर और अव्यवस्थित बस्तियाँ सबसे ज़्यादा प्रभावित होती हैं।
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राहत शिविरों में स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर अभी भी संतोषजनक नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जम्मू जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन योजना बनानी होगी, जिसमें—
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नदी तटबंधों की मरम्मत,
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जल निकासी प्रणाली का आधुनिकीकरण,
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और शहरी नियोजन में बदलाव शामिल होना चाहिए।
भविष्य की तैयारी: जलवायु परिवर्तन की चुनौती
जलवायु वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि आने वाले वर्षों में भारत में अत्यधिक बारिश और अचानक बाढ़ की घटनाएँ बढ़ेंगी।
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शहरीकरण ने जल निकासी मार्गों को अवरुद्ध कर दिया है।
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जंगलों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव ने प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ा है।
जम्मू की बाढ़ केवल एक आपदा नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी भी है। प्रशासन और समाज को मिलकर दीर्घकालिक समाधान ढूँढना होगा—
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स्थानीय स्तर पर आपदा प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल।
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सामुदायिक आपदा प्रबंधन समितियाँ बनाना।
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स्कूल-कॉलेजों में आपदा शिक्षा को शामिल करना।
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राहत कार्यों में प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल, जैसे ड्रोन और जीआईएस मैपिंग।
निष्कर्ष
जम्मू की बाढ़ ने दिखा दिया कि संकट चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर प्रशासन, सेना, स्वयंसेवक और नागरिक मिलकर काम करें तो बड़े नुकसान से बचा जा सकता है। इस बार सबसे बड़ी राहत यह रही कि जनहानि नहीं हुई।
लेकिन यह भी सच है कि बाढ़ जैसी आपदाएँ अब अपवाद नहीं रहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और शहरी दबाव की वजह से बार-बार सामने आने वाली वास्तविकता हैं। ऐसे में प्रशासन को केवल तात्कालिक राहत पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों पर भी ध्यान देना होगा।
जम्मू के इस अनुभव से पूरे देश के लिए सबक यही है—
👉 आपदा प्रबंधन केवल सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से ही संभव है।
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