खाड़ी में युद्ध और कूटनीति के बीच फंसी दुनिया; क्या ट्रंप का ‘शांति दांव’ हकीकत है या रणनीति?

 

नई दिल्ली/दुबई।

 

मध्य पूर्व में चल रहा संघर्ष अब अपने सबसे निर्णायक और भ्रमित करने वाले दौर में पहुंच गया है। एक तरफ युद्ध के मैदान में मिसाइलें बरस रही हैं, वहीं दूसरी ओर वाशिंगटन और तेहरान के बीच ‘बयानों का युद्ध’ जारी है। इस पूरे परिदृश्य को तीन प्रमुख कोणों से समझा जा सकता है:

ट्रंप का 5-दिवसीय’ सस्पेंस : कूटनीति या सैन्य पुनर्गठन?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह दावा कि “ईरान के साथ बहुत अच्छी बातचीत चल रही है”, वैश्विक राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है।

तर्क (पक्ष) : विशेषज्ञों का एक वर्ग, जिसमें इजरायली विश्लेषक गिदोन लेवी शामिल हैं, का मानना है कि ट्रंप युद्ध को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं हैं और पर्दे के पीछे वास्तव में कुछ “पक” रहा है।

तर्क (विपक्ष) : तेहरान द्वारा इस बातचीत को सिरे से खारिज करना और ट्रंप का ऊर्जा ठिकानों पर हमले को 5 दिन के लिए टालना एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है। यह समय अमेरिकी सेना को क्षेत्र में अपनी स्थिति (Boots on the ground) और मजबूत करने के लिए मिल सकता है।

वैश्विक ऊर्जा संकट और भारत की फेंस-वॉकिंग

ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बाधित करने की धमकी ने दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं।

भारत का रुख : भारत के लिए यह दोहरा संकट है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमेरिकी सचिव मार्को रूबियो के बीच हुई बातचीत साफ करती है कि भारत की प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा है। भारतीय जहाजों का खतरे के बावजूद इस मार्ग से गुजरना यह दर्शाता है कि भारत अपनी आपूर्ति श्रृंखला को टूटने नहीं देना चाहता।

IEA की ऐतिहासिक कार्रवाई : 32 देशों द्वारा 400 मिलियन बैरल तेल रिलीज करने का फैसला यह बताता है कि दुनिया 2022 के यूक्रेन संकट से भी बड़े आर्थिक झटके के लिए तैयार हो रही है।

इजरायल और लेबनान : बदलता हुआ भूगोल

युद्ध केवल ईरान तक सीमित नहीं है। इजरायली वित्त मंत्री स्मोट्रिच का यह बयान कि “इजरायल की नई सीमा लितानी नदी होनी चाहिए”, बेहद खतरनाक संकेत है।

यह न केवल लेबनान की संप्रभुता को चुनौती देता है, बल्कि एक पूर्ण पैमाने पर ‘जमीनी आक्रमण’ (Ground Invasion) की आहट देता है।

इजरायल इस समय किसी भी ऐसी ‘शांति संधि’ के खिलाफ दबाव बना रहा है जो उसे ईरान या उसके सहयोगियों पर हमले करने से रोके।

क्षेत्रीय मध्यस्थों की भूमिका : पाकिस्तान और रूस

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव दोनों ने तेहरान से संपर्क साधा है।

पाकिस्तान : अपनी आर्थिक बदहाली और सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौतों के कारण पाकिस्तान इस युद्ध में ‘शांतिदूत’ बनकर अपनी तेल आपूर्ति सुरक्षित रखना चाहता है।

रूस : रूस ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान के परमाणु ठिकानों (जैसे बुशहर प्लांट) पर हमला “बेहद खतरनाक” होगा और यह युद्ध कैस्पियन सागर तक फैल सकता है।

अगले 96 से 120 घंटे वैश्विक राजनीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। यदि ट्रंप का ‘शांति समझौता’ सफल होता है, तो यह सदी की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी। लेकिन अगर यह केवल ‘समय खरीदने’ की चाल निकली, तो 5 दिन बाद ऊर्जा ठिकानों पर होने वाले हमले वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक ऐसे मंदी के दौर में धकेल देंगे जिससे उबरना मुश्किल होगा।

 

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