
उदयपुर/जमशेदपुर।
स्टील और मेटल उद्योग में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के उद्देश्य से हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (HZL) और टाटा स्टील ने अपने दो दशक पुराने रणनीतिक संबंधों को एक नए स्तर पर पहुँचाया है। दोनों कंपनियों ने अब ‘इकोजेन’ (EcoZen) नामक लो-कार्बन जिंक समाधान को बढ़ावा देने के लिए हाथ मिलाया है।
क्या है ‘इकोजेन’ और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
इकोजेन एशिया का पहला कम कार्बन वाला जिंक है, जिसे पूरी तरह से नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) का उपयोग करके उत्पादित किया जाता है। पारंपरिक जिंक की तुलना में इकोजेन का कार्बन फुटप्रिंट 75 प्रतिशत कम है। जहाँ वैश्विक औसत प्रति टन जिंक पर भारी उत्सर्जन का है, वहीं इकोजेन का उत्सर्जन 1 टन से भी कम है।
स्टील उद्योग पर प्रभाव : स्टील को जंग से बचाने के लिए ‘गैल्वेनाइजेशन’ (Galvanization) प्रक्रिया में जिंक का उपयोग अनिवार्य है। इकोजेन के उपयोग से प्रति टन गैल्वेनाइज्ड स्टील पर लगभग 400 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सकता है।
साझेदारी के मुख्य उद्देश्य : स्कोप 3 उत्सर्जन में कमी: टाटा स्टील जैसी कंपनियों के लिए अपने ‘स्कोप 3’ (सप्लाई चेन) उत्सर्जन को कम करना एक बड़ी चुनौती है। इकोजेन जैसा कच्चा माल इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सीधी मदद करता है।
हरित आपूर्ति श्रृंखला (Green Supply Chain) : हिंदुस्तान जिंक के सीईओ अरुण मिश्रा के अनुसार, यह साझेदारी भारत के औद्योगिक इकोसिस्टम में टिकाऊ समाधानों को अपनाने का एक मील का पत्थर है।
जलवायु-अनुकूल खरीद : टाटा स्टील के चीफ प्रोक्योरमेंट ऑफिसर रंजन सिन्हा ने साहिबाबाद प्लांट में इकोजेन की पहली डिलीवरी का स्वागत करते हुए इसे ‘सस्टेनेबल प्रोक्योरमेंट’ की दिशा में बड़ी जीत बताया।
व्यापक प्रभाव (Industrial Impact) : जिंक का उपयोग केवल स्टील तक सीमित नहीं है; यह बुनियादी ढांचा, ऑटोमोटिव, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा भंडारण (बैटरी) जैसे क्षेत्रों के लिए भी रीढ़ की हड्डी है। इस साझेदारी से इन सभी डाउनस्ट्रीम उद्योगों को अपने डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों को पूरा करने का एक ठोस मार्ग मिलेगा।
यह सहयोग साबित करता है कि कैसे पारंपरिक भारी उद्योग नवाचार के जरिए जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। टाटा स्टील और हिंदुस्तान जिंक की यह पहल भारत को 2070 तक ‘नेट जीरो’ के लक्ष्य की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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