
जयपुर। राजस्थान में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी और कड़ा रुख प्रशासनिक सुस्ती पर एक करारा प्रहार है. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ द्वारा राज्य चुनाव आयोग को 5 दिन के भीतर तारीखें बताने का निर्देश और ‘अवमानना की कार्रवाई’ की चेतावनी यह साफ करती है कि न्यायपालिका अब जनहित के लोकतांत्रिक मुद्दों पर बहानेबाजी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है.
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम और कोर्ट रूम ड्रामे का अगर आलोचनात्मक विश्लेषण किया जाए, तो यह शासन, स्वायत्त संस्थाओं और विशेष आयोगों के बीच आपसी तालमेल की गंभीर कमी और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की प्रवृत्ति को उजागर करता है.
तैयारी का दावा बनाम जवाबदेही से यू-टर्न
सुनवाई के दौरान राज्य चुनाव आयोग का यह कहना कि “हमारी तैयारी पूरी है, लेकिन सरकार ने लॉटरी नहीं दी,” एक क्लासिक प्रशासनिक डिफेंस मैकेनिज्म (बचाव का तरीका) है.
पहला अंतर्विरोध : चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जिसका काम समय पर निष्पक्ष चुनाव कराना है. यदि राज्य सरकार आरक्षण का वर्गीकरण या वार्डों की लॉटरी अटकाकर बैठी थी, तो आयोग ने समय रहते इस गतिरोध को तोड़ने के लिए क्या कदम उठाए?
दूसरा अंतर्विरोध : 22 मई को ही हाईकोर्ट ने स्पष्ट तौर पर 31 जुलाई 2026 तक चुनाव संपन्न कराने की समय सीमा तय कर दी थी. जब आधा जुलाई बीत गया और कोर्ट ने ‘अवमानना’ का हंटर दिखाया, तब जाकर आयोग सरकार की विफलता की दुहाई दे रहा है. यह दिखाता है कि बिना अदालती डंडे के हमारी व्यवस्थाएं स्वतः काम करने में अक्षम साबित हो रही हैं.
ओबीसी आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे लचर और गैर-जिम्मेदाराना भूमिका अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग की नजर आती है. कोर्ट की यह टिप्पणी पूरी तरह तार्किक और सही है कि “जब 9 मई 2025 को 3 महीने के लिए आयोग बना था, तो रिपोर्ट अब तक क्यों नहीं आई?”
समय सीमा का मखौल: एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी रिपोर्ट का तैयार न होना यह साबित करता है कि आयोगों का गठन अक्सर समय काटने या राजनीतिक प्राथमिकताओं को साधने के लिए किया जाता है, न कि समयबद्ध नतीजों के लिए.
अकर्मण्यता : कोर्ट ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि “काम नहीं होता तो मना कर दीजिए”—यह सीधे तौर पर आयोग की अकर्मण्यता और प्रशासनिक रीढ़ की कमी पर एक बड़ा सवालिया निशान है.
राज्य सरकार की मंशा पर संदेह : क्या चुनाव टालने की रणनीति है?
निकाय और पंचायत स्तर के चुनाव जमीनी लोकतंत्र की बुनियाद होते हैं. राज्य सरकार द्वारा वार्डों की आरक्षण लॉटरी जारी करने में ढिलाई बरतना यह संकेत देता है कि शायद राजनीतिक नेतृत्व इन चुनावों को अपनी सुविधानुसार टालना चाहता है. जमीनी स्तर पर सत्ता के विकेंद्रीकरण को रोकने या उसे टालने का यह रवैया लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है.
5 दिन का अल्टीमेटम और आगे की राह
हाईकोर्ट ने अब गेंद तीनों पक्षों (चुनाव आयोग, ओबीसी आयोग और राज्य सरकार) के पाले में डाल दी है. सोमवार तक तीनों को क्रमशः चुनाव की तारीखें, रिपोर्ट की डेडलाइन और लॉटरी की तिथि बतानी होगी.
यह पूरी स्थिति इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि राजस्थान में स्थानीय शासन और त्रिस्तरीय लोकतंत्र फिलहाल प्रशासनिक लेटलतीफी, आयोगों की सुस्ती और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के त्रिकोण में फंसा हुआ है. देखना यह है कि सोमवार को कोर्ट के सामने ये संस्थाएं कोई ठोस रोडमैप रखती हैं या फिर तारीखों के जाल में एक नया बहाना ढूंढ निकाला जाता है.
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